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रश्मियाँ दिखतीं नहीं - ग़ज़ल

मापनी  २१२२ २१२२ २१२२ २१२ 

उपवनों में फूल कलियाँ तितलियाँ दिखतीं नहीं 

रोज कोयल खोजती अमराइयाँ दिखतीं नहीं 

 

हो गई आँखों से ओझल ऋतु बसंती प्यार की

तप रहा मन का मरुस्थल बदलियाँ दिखतीं नहीं

 

कौन सा यह आवरण ओढ़ा हुआ है आपने

सुन न पाते सिसकियाँ, दुश्वारियाँ दिखतीं नहीं

 

चमचमाते हैं महल सब, जगमगाता हर शिखर 

तलहटी में ही मुझे ये रश्मियाँ दिखतीं नहीं 

 

काव्य सरिता बह रही है बंधनों को तोड़कर

कथ्य अनगढ़, भाव में गहराइयाँ दिखतीं नहीं 

 

जब उजाले पास थे तब एक लश्कर साथ था

है अँधेरा आज तो परछाइयाँ दिखतीं नहीं

 

छुट्टियाँ ननिहाल की. वो ताल, पनघट, मस्तियाँ 

अब कहीं वो सर्दियाँ वो गर्मियाँ दिखतीं नहीं

"मौलिक एवं अप्रकाशित "

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2021 at 10:11am

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' जी सादर नमस्कार

आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on April 17, 2021 at 10:35pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, ख़ूबसूरत ग़ज़ल पेश की है आपने दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।  सादर।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 17, 2021 at 1:09pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार

आपका स्नेह मिला सृजन सार्थक हुआ 

सादर नमन आपको 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 17, 2021 at 12:53pm

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । बहुत ही मनभावन गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 17, 2021 at 12:46pm

आदरणीय Aazi Tamaam जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by Aazi Tamaam on April 17, 2021 at 12:14pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है बेहद मधुर लयबद्ध किया गया है

सादर प्रणाम आदरणीय बसंत जी

बधाई स्वीकारें

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 17, 2021 at 11:14am

आदरणीया Rachna Bhatia जी सादर नमस्कार एवं प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार नमन 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 17, 2021 at 11:14am

आदरणीय Chetan Prakash जी, सादर नमस्कार , आपकी प्रेरक प्रतिक्रिया और सुझाव को सादर नमन - बसंत 

Comment by Rachna Bhatia on April 17, 2021 at 8:34am

वाह वाह वाह

बेहतरीन ग़ज़ल हुई। आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी हार्दिक बधाई।

Comment by Chetan Prakash on April 17, 2021 at 7:41am

बंधुवर, बसंत कुमार शर्मा जी अच्छी हिंदी ग़ज़ल हुई है! 'तलहटी में मुझे 'ये' रश्मियाँ दिखती नहीं ' यहाँ 'ये' के स्थान पर, सर्वनाम 'वो' होना चाहिए ! सार्थक ग़ज़ल हेतु बधाई, भाई! 

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