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ग़ज़ल: "दाँव पर आबरू सी रहती है "

2122 1212 22

बे सबब हाव-हू सी रहती है

दाँव पर आबरू सी रहती है

इश्क़ जब भी किसी से होता है

इक अजब जुस्तजू सी रहती है

लम्हा दर लम्हा दिल मचलता है

हर पहर आरज़ू सी रहती है 

यूँ लगे की हर एक चहरे पर

सूरत इक हू-ब-हू सी रहती है

मन भटकता है वन हिरन बनकर

खुशबु इक रू-ब-रू सी रहती है

ख़ुद से ही अब वो बात करता है

दिल में इक गुफ़्तगू सी रहती है

जलके सब ख़ाक हो गये "आज़ी"

फ़िर भी इक राख बू सी रहती है. 

(मौलिक व अप्रकाशित)

आज़ी तमाम

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Comment

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Comment by Aazi Tamaam on March 16, 2021 at 7:12pm

सादर प्रणाम आदरणीय ब्रजेश जी

हौसला अफ़ज़ाई के लिये सहृदय धन्यवाद

Comment by Aazi Tamaam on March 16, 2021 at 7:11pm

सादर प्रणाम आदरणीय धामी जी

हौसला अफ़ज़ाई के लिये सहृदय धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 16, 2021 at 6:41pm

आ. भाई आज़ी तमाम जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 16, 2021 at 4:10pm

बढ़िया भावपूर्ण ग़ज़ल कही भाई.. बधाई

Comment by Aazi Tamaam on March 15, 2021 at 11:00pm

सादर प्रणाम आदरणीय गुरु जी

आपकी टिप्पणी का बेसब्री से इंतज़ार था

शुक्रिया ग़ज़ल तक आने व मार्गदर्शन करने के लिये

मैं एडिट करके फिर से पोस्ट करता हूँ

Comment by Samar kabeer on March 15, 2021 at 7:30pm

जनाब आज़ी तमाम जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'ख़ुद-ब-ख़ुद से ही बात करता है'

इस मिसरे को यूँ कहना उचित होगा:-

'ख़ुद से ही अब वो बात करता है'

Comment by Aazi Tamaam on March 12, 2021 at 10:59am

सादर प्रणाम आदरणीय अमीर जी

दिल से शुक्रिया ग़ज़ल तक आने एवं मार्गदर्शन कर ग़ज़ल को रोचक बनाने में मदद करने के लिये

क्षमा चाहूँगा राख बू शब्द मैंने मेरे बेहद प्रिय आदरणीय गुलज़ार साहब की नज़्म से लिया है

गौर फर्मायियेगा

जगह नहीं है और डायरी में,
ये ऐस्ट्रे पूरी भर गई है
भरी हुई है जले-बुझे अधकहे खयाल की राख बू से,
खयाल पूरी तरह से जोकि जले नहीं थे
मसल दिय़ा या दबा दिय़ा था बुझे नहीं वो,

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on March 12, 2021 at 10:43am

जनाब आज़ी तमाम साहिब आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ।

2122 1212 22

दाव पर आबरू सी रहती है             'दाव' को 'दाँव' कर लें 

इक अज़ब जुस्तजू सी रहती है         'अज़ब' को 'अजब' कर लें 

यूँ लगे की हर एक चेहरे पर.             इस शे'र को यूँ भी कह सकते हैं-  'तेरी सूरत हर एक चहरे में'

सूरत इक हू-ब-हू सी रहती है.                                                          दिखती बस हू-ब-हू सी रहती है' 

मन भटकता है वन हिरन बनकर      इस मिसरे को यूँ कहें- 'मन उचकता है ये हिरन बनकर' 

ख़ुद-ब-ख़ुद से ही बात करता है.       इस मिसरे का वाक्य विन्यास ठीक नहीं है। यूंँ कहें- 'ख़ुद ही ख़ुद से मैं बात करता हूँ'

फ़िर भी इक राख-बू सी रहती है.     'राख-बू'? शब्द विन्यास ठीक नहीं है।  सादर। 

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