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राधे इस बार गाँव लौटा तो उसने देखा कि उसके दबंग पड़ौसी ने वाकई उसके दरवाजे पर अपना ताला जड़ दिया था ।

दर असल जयसिंह उसे कहता, " काम जब करते ही शहर में हो तो मकान हमें दे दो" कभी कहता, " मान जाओ, नहीं तो तुम्हारे जाते ही अपना ताला डाल दूंगा ।"
राधे को एकाएक कुछ सूझा, बच्चों और पत्नि को वहीं खड़े रहने को कहा, खुद भागा-भागा अपने दोस्त करीमू के पास जा पहुँँचा और बोला, " भाई करीमू, चल, चल जल्दी कर, बच्चे ठंडी रात मे घर से बाहर खड़े है, ताला खोल" ! चाबी मुझ से रास्ते मे खो गयी, इस बार" ! करीमू ने अपने कुछ औजार और चाबियों का गुच्छा अपने थैले में डाले और राधे के साथ चला आया । जल्दी ही एक चाबी लग गयी ।

राधे ने एक लम्बित सांस भरी और खुशी खुशी पुन: गृह प्रवेश सम्पन्न हुआ ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Chetan Prakash on February 12, 2021 at 7:05am

आदरणीय समर कबीर साहब, नमन, लघुकथा 'नवचाार' आपकी अनुशंसा पा सकी, मुझे आवश्यक प्रोत्साहन मिला। मोहतरम जनाब, आपकी नवजिशों का बहुत शुक्रगुज़ार हूँ ।

Comment by Samar kabeer on February 9, 2021 at 6:00pm

जनाब चेतन प्रकाश जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

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