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जाने क्यूँ आज है औरत की ये औरत दुश्मन

2122 1122 1122 22(112)

जाने क्यूँ आज है औरत की ये औरत दुश्मन,
पास दौलत है तो उसकी है ये दौलत दुश्मन ।

दोस्त इस दौर के दुश्मन से भी बदतर क्यूँ हैं,
देख होती है मुहब्बत की हकीकत दुश्मन ।

माँग लो जितनी ख़ुदा से भी ये ख़ुशियाँ लेकिन,
हँसते-हँसते भी हो जाती है ये जन्नत दुश्मन ।

मैं बदल सकता था हाथों की लकीरों को मगर,
यूँ न होती वो अगर मेरी मसर्रत दुश्मन ।

ऐसे इंसानों की बस्ती से रहो दूर जहॉं,
'हर्ष' हो जाए मुहब्बत की मुहब्बत दुश्मन ।

"स्वरचित व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Harash Mahajan on September 9, 2020 at 7:17pm

आदरणीय डिंपल जी मेरी रचना पर आपकी आमद और उस पर आपकी प्रतिक्रिया का बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Dimple Sharma on September 9, 2020 at 4:23pm

आदरणीय हर्ष महाजन जी नमस्ते, खुबसूरत ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार करें आदरणीय, मतले के दोनों मिसरे में तालमेल कम लग रहा है आदरणीय , वैसे मैं बहुत जानकार नहीं अतः गुणीजनों के कमेन्ट पर ही सही निर्णय लें , बाकी सारे शेर ठीक ठीक हैं कृप्या अन्यथा न लें मैं भी सीख ही रही हूं ।

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