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बस यही सोच के फेंका था जाल आंखों में...

पूछते क्या हो यूं लेकर सवाल आंखों में
पढ सको पढ लो मेरा सारा हाल आंखों में

देखना था कि समंदर से क्या निकलता है
बस यही सोच के फेंका था जाल आंखों में

वो मिरे सामने आती है झुकाए पलकें
हया को रखा है उसने संभाल आंखों में

नजर से नब्ज पकडकर इलाज कर भी कर दे
वो लेकर चलती है क्या अस्पताल आंखों में

जो उसका साथ है तो तीरगी से डर कैसा
इश्क में जलने लगती है मशाल आंखों में।। #अतुल
                   

                                (मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on May 2, 2020 at 6:34pm

आद0 अतुल कुशवाह जी सादर अभिवादन। इस रचना का शिल्प क्या है क्योंकि यह किसी निश्चित बह्र में नहीं लगी। मंच पर शिल्प लिखने की परंपरा रही है जिससे रचना को देखा और उससे कुछ सीखा जा सके। बहरहाल बधाई स्वीकारें। सादर

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