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एक दुजे के अब हबीब नहीं रहे हैं
लोकतंत्र औ हम करीब नहीं रहे हैं

फसल की वाज़िब मिले क़ीमत ऐसी तो
हम किसानों के नसीब नहीं रहें हैं

खत्म करके सब गरीबों को मुल्क से
घोषणा कर दो गरीब नहीं रहे हैं

हर ज़ुल्म हमने सहे हैं मगर फिर भी
यूँ कभी भी बेतर्तीब नहीं रहें हैं

मंदिर मस्जिद एक साथ न हो कभी भी
इस क़द्र तंग तहज़ीब नहीं रहे हैं


दण्डपाणि नाहक
मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 25, 2018 at 7:14am

आ. दण्डपाणि जी, हार्दिक बधाई ।

Comment by surender insan on March 23, 2018 at 10:44pm

आद. दण्डपाणि जी सादर नमन।वाह अच्छा प्रयास है आपका बधाई। मोहतरम समर साहब की सलाह पर गौर करे।

स्थापित शायरों का कलाम पढ़े। भाषा का ख्याल रखते हुए वाक्य रचना करे। यही पटल पे बहुत से लेख है ग़ज़ल की बाबत उन्हें पढ़े। यक़ीनन आप और अच्छा कहेंगे।

सादर जी।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 22, 2018 at 7:23pm

अच्छा प्रयास है आ. दण्डपाणी जी 
बहर यानी लय का अभ्यास/ अध्ययन कीजिये 
सादर 

Comment by Mohammed Arif on March 22, 2018 at 4:39pm

आदरणीय दंडपाणि जी आदाब,

                        ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की इस्लाह का तत्काल प्रभाव से संज्ञान लें । प्रयास हेतु हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on March 22, 2018 at 3:07pm

जनाब दण्डपाणि नाहक़ जी आदाब,  बह्र के साथ ग़ज़ल के शिल्प और व्याकरण पर अभी बहुत मिहनत की ज़रूरत है,इसके लिए पुराने शायरों का कलाम पढ़ें और ओबीओ पटल पर मौजूद ग़ज़लों और आलेखों का अध्यन करें ।

इस प्रयास हेतु बधाई स्वीकार करें ।

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