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आशीष यादव's Blog (55)

कहो सूरमा! जीत लिए जग?

कहो सूरमा! जीत लिए जग? 

तुम्हें पता है जीत हार का? 

केवल बारूदों के दम पर 

फूँक रहे हो धरती सारी 

नफरत की लपटों में तुमने 

धधकाई करुणा की क्यारी 

कितना आतंकित है…

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Added by आशीष यादव on September 2, 2021 at 1:00am — 5 Comments

स्वयं को आजमाने को तू खुलकर आ जमाने में

स्वयं को आजमाने को

तू खुलकर आ जमाने में

बहुत अनमोल है जीवन

गवाँता क्यों बहाने में

नदी के पास बैठा है

दबा के प्यास बैठा है

तुझे मालूम है, तुझमें

कोई एहसास बैठा है

किनारे कुछ न पाओगे

मिलेगा डूब जाने में

तुम्हारे सामने दुनिया

सुनो रणभूमि जैसी है

स्वयं का तू ही दुश्मन है

स्वयं का तू हितैषी है

कहीं पीछे न रह जाना

स्वयं से ही निभाने में

कहाँ दसरथ की दौलत …

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Added by आशीष यादव on July 1, 2021 at 2:30am — 4 Comments

वरना पीठ दिखाने से तो अच्छा है तुम मर जाओ

रणभेरी बजने से पहले अच्छा है तुम घर जाओ

वरना पीठ दिखाने से तो अच्छा है तुम मर जाओ

कितनी ही आशाएं तुमसे लगी हुई है, टूटेंगीं

कितनी ही तकदीरें तुमसे जुड़ी हुई हैं, रूठेगीं



तेरे पीछे मुड़ जाने से कितने सिर झुक जाएंगे

कितने प्राण कलंकित होंगे कितने कल रुक जाएंगे



उतर गए हो बीच समर तो कौशल भी दिखला जाओ

हिम्मत के बादल बन कर तुम विपदाओं पर छा जाओ

तप कर और प्रबल बनकर तुम शोलों बीच सँवर जाओ

वरना पीठ दिखाने से तो अच्छा है तुम…

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Added by आशीष यादव on May 28, 2021 at 12:11am — 7 Comments

याद तुम्हारी

याद तुम्हारी क्या बतलाऊँ

कैसे कैसे आ रही है

चलने का अंदाज़ ठुमक कर

मचल-मचल कर और चहक कर

हाथों को लहरा-लहरा कर

अदा-अदा से और विहँस कर

तेरी सुंदर-सुंदर बातें

मन हर्षित है गाते-गाते

मैं कब से आवाज दे रहा

आ जाते हँसते-मुस्काते

तेरे गालों वाले डिम्पल

याद आते हैं मुझको पल-पल

मिसरी में पागे होठों के

नाज़ुक चुम्बन कोमल-कोमल

एक छवि मुस्कान बटोरे

मुझको अपने परितः घेरे

सुंदर सुखद समीर…

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Added by आशीष यादव on April 24, 2021 at 4:36am — 1 Comment

बोलो मैं कैसे बिकता

एक गजल तेरे होठों पर लिख सकता था

इसकी टपक रही लाली पर बिक सकता था

किंतु सामने जब शहीद की पीर पुकारे

जान वतन पर देने वाला वीर पुकारे

जिसने भाई, लाल, कंत कुर्बान किये हों

सूख चुकी उनकी आँखों का नीर पुकारे

कैसे उन क़ातिल मुस्कानों पर बिकता

कैसे कोमल नाजुक होठों पर लिखता



एक गजल तेरी आँखों पर लिख सकता था

चंचल चितवन सी कमान पर बिक सकता था

पर कौरव-पांडव दल आँखें मींच रहा हो

चीर दुःशासन द्रुपद-सुता की…

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Added by आशीष यादव on September 6, 2020 at 8:30pm — 8 Comments

ये जिंदगी का हसीन लमहा

(12122)×4

ये ज़िंदगी का हसीन लमहा

गुजर गया फिर तो क्या करोगी

जो जिंदगी के इधर खड़ा है

उधर गया फिर तो क्या करोगी

तुम्हें सँवरने का हक दिया है

वो कोई पत्थर का तो नहीं है

लगाये फिरती हो जिसको ठोकर

बिखर गया फिर तो क्या करोगी

कि जिनकी शाखों पे तो गुमां है

मगर उन्हीं की जड़ों से नफरत

"वो आँधियों में  उखड़ जड़ों से"

शज़र गया फिर तो क्या करोगी

जिसे अनायास कोसती हो

छिपाए बैठा है पीर…

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Added by आशीष यादव on August 25, 2020 at 2:30am — 6 Comments

मगर हड़का रहा है (गजल)

उसकी ना है इतनी सी औकात मगर हड़का रहा है

झूठे में ही खा जाएगा लात मगर हड़का रहा है

औरों की बातों में आकर गाल बजाने वाला बच्चा

जिसके टूटे ना हैं दुधिया दाँत मगर हड़का रहा है

जिसके आधे खर्चे अपनी जेब कटाकर दे रहे हैं

अबकी ढँग से खा जायेगा मात मगर हड़का रहा है

आदर्शों मानवमूल्यों को छोड़ दिया तो राम जाने

कितने बदतर होंगे फिर हालात मगर हड़का रहा है

उल्फत की शमआ पर पर्दा डाल रहा है बदगुमानी

कटना मुश्किल है नफरत की रात…

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Added by आशीष यादव on August 10, 2020 at 6:36pm — No Comments

उसने पी रखी है

2122 2122 2122 2122

वो न बोलेगा हसद की बात उसने पी रखी है

सिर्फ़ होगी प्यार की बरसात उसने पी रखी है

होश में दुनिया सिवा अपने कहाँ कुछ सोचती है

कर रहा है वो सभी की बात उसने पी रखी है

मुँह पे कह देता है कुछ भी दिल में वो रखता नहीं है

वो समझ पाता नहीं हालात उसने पी रखी है

झूठ मक्कारी फ़रेबी ज़ुल्म का तूफ़ाँ खड़ा है

क्या वो सह पायेगा झंझावात? उसने पी रखी है

जबकि सब दौर-ए-जहाँ में लूटकर घर भर रहे हों…

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Added by आशीष यादव on August 3, 2020 at 12:30pm — 4 Comments

पानी गिर रहा है

2122 2122 2122 2122

इश्क बनता जा रहा व्यापार पानी गिर रहा है 

हुस्न रस्ते में खड़ा लाचार पानी गिर रहा है

चंद जुगनू पूँछ पर बत्ती लगाकर सूर्य को ही

बेहयाई से रहे ललकार पानी गिर रहा है 

टाँगकर झोला फ़कीरी का लबादा ओढ़कर अब

हो रहा खैरात का व्यापार पानी गिर रहा है 

बाप दादों की कमाई को सरे नीलाम कर वह

खुद को साबित कर रहा हुँशियार पानी गिर रहा है 

झूठ के लश्कर बुलंदी की तरफ बढ़ने लगे हैं

साँच की होने लगी…

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Added by आशीष यादव on July 30, 2020 at 5:21am — 8 Comments

यह प्रणय निवेदित है तुमको

हे रूपसखी हे प्रियंवदे

हे हर्ष-प्रदा हे मनोरमे

तुम रच-बस कर अंतर्मन में

अंतर्तम को उजियार करो

यह प्रणय निवेदित है तुमको

स्वीकार करो, साकार करो

अभिलाषी मन अभिलाषा तुम

अभिलाषा की परिभाषा तुम

नयनानंदित - नयनाभिराम

हो नेह-नयन की भाषा तुम

हे चंद्र-प्रभा हे कमल-मुखे

हे नित-नवीन हे सदा-सुखे

उद्गारित होते मनोभाव

इनको ढालो, आकार करो

यह प्रणय निवेदित है तुमको

स्वीकार करो साकार करो

मैं तपता…

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Added by आशीष यादव on June 15, 2020 at 4:30am — 10 Comments

हाँ बहुत कुछ याद है

अकेले तुम नहीं यारा

तुम्हारे साथ और भी बात

मुझे हैं याद



कि जैसे फूल खिला हो

तुम हसीं, बिलकुल महकती सी

चहकती सी

 मृदुल किरणों में धुलकर आ गई

और छा गई

जैसे कि बदली जून की

तपती दोपहरी से धरा को छाँव देती

ठाँव देती हो मुसाफिर को



कि जैसे झील हो गहरी

कि ये भहरी…

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Added by आशीष यादव on April 17, 2020 at 7:09am — 2 Comments

कोरोना

नहीं हमारी नहीं तुम्हारी

अखिल विश्व में महा-बिमारी

आई पैर पसार

भैया मत छोड़ो घर-द्वार

भैया मत छोड़ो घर-द्वार 

निकल चीन से पूर्ण जगत में डाल दिया है डेरा

यह विषाणु से जनित बिमारी, खतरनाक है घेरा

रहो घरों में रहो अकेले

नहीं लगाओ जमघट मेले

कहती है सरकार

भैया मत छोड़ो घर-द्वार 

नहीं आम यह सर्दी-खाँसी इसका नाम कोरोना

नहीं दवाई इसकी, होने पर केवल है रोना

इसीलिए मत घर से निकलो

धीर धरो पतझड़ से निकलो

मानो…

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Added by आशीष यादव on April 4, 2020 at 11:33am — 2 Comments

नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो

नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो 

घर आँगन में उजियारा हो

दुःखों का दूर अँधियारा हो

हो नई चेतना नवल स्फूर्ति

नित नव प्रभात आभामय हो

नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो 

नित नई नई ऊँचाई हो

हृद प्राशान्तिक गहराई हो

नित नव आयामों को चूमो

चहुँओर तुम्हारी जय जय हो

नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो 

जो खुशियाँ अब तक नहीं मिलीं

जो कलियाँ अब तक नहीं खिलीं

जीवन के नूतन अवसर पर

उनका मिलना-खिलना तय हो

नव वर्ष तुम्हे मंगलमय…

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Added by आशीष यादव on January 1, 2020 at 12:31am — 13 Comments

सच सच बोलो आओगी ना

सच सच बोलो आओगी ना

जब सूरज पूरब से पश्चिम

तक चल चल कर थक जाएगा

और जहाँ धरती अम्बर से

मिलती है उस तक जाएगा

चारो ओर सुनहला मौसम

और सुनहली लाली होगी

और लौटते पंछी होंगें

खेत-खेत हरियाली होगी 

 

दिन भर के सब थके थके से

अपने घर को जाते होंगे

कभी झूम कर कभी मन्द से

पवन बाग लहराते होंगे 

 

तुम भी उसी बाग के पीछे

आकर उसी आम के नीचे

झूम-झूम कर मेरे ऊपर

तुम खुद को लहराओगी ना

सच सच बोलो…

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Added by आशीष यादव on December 22, 2019 at 10:30pm — 4 Comments

फ़लक पे चाँद ऊँचा चढ़ रहा है


फ़लक पे चाँद ऊँचा चढ़ रहा है।
तेरी यादों में गोते खा रहा हूँ
हवा हौले से छूकर जा रही है।
तेरी खुशबू में भीगा जा रहा हूँ।


लिपट कर चाँदनी मुझसे तुम्हारे
बदन का खुशनुमा एह्सास देती
कभी तन्हा अगर महसूस होता
ढलक कर गोद में एक आस देती


नहीं हो तुम मगर ये सब तुम्हारे
यहाँ होने का एक जरिया बने हैं
समा पाऊँ तेरी गहराइयों में
हवा खुशबू फ़लक दरिया बने हैं। 

 

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by आशीष यादव on December 20, 2019 at 10:13am — 2 Comments

तुमने उसकी याद दिला दी

जाने अनजाने में कितनी

जिसे सोचते रातें काटीं

लम्हों-लम्हों में किश्तों में

जिनको अपनी साँसें बाटीं

कभी अचानक कभी चाहकर

जिसे ख़यालों में लाता था

और महकती मुस्कानों पर

सौ-सौ बार लुटा जाता था 

उसकी बोली बोल हृदय में

तुमने जैसे आग लगा दी

तुमने उसकी याद दिला दी



अँधियारी रजनी में खिलकर

चम-चम करने लगते तारे

इक चंदा के आ जाने से

फ़ीके पड़ने लगते सारे

शीतल शांत सजीवन नभ में

रजत चाँदनी फैलाता था

तम-गम में भी…

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Added by आशीष यादव on December 20, 2019 at 10:00am — 4 Comments

तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम सुगंध खिलते गुलाब सी

सुन्दर कोमल मधुर ख्वाब सी

मैं मरुथल का प्यासा हरिना

ललचाती मुझको सराब* सी

तुमको पाने की चाहत में

अब तक मचल रही हैं साँसें

तुम ही कह दो तुमको अपने

प्राणों का मनमीत लिखूँ क्या

तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम शीतल हो चंदन वन सी

तुम निर्मल-जल, तुम उपवन सी

तुम चंदा सी और चाँदनी-

सी तुम हो, तुम मलय-पवन सी

नयन मूँद कर तुमको देखूँ…

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Added by आशीष यादव on December 15, 2019 at 3:00pm — 2 Comments

दर्द

ये रातें जल रही हैं,

वो बातें खल रही हैं

लगा दी ठेस तुमने दिल के अंदर

नसें अंगार बनकर जल रही हैं

मौसम सर्द है,

जीवन में लेकिन

लगी है आग,

तन मन जल रहा है।

जिसे उम्मीद से बढ़कर था माना

वही घाती बना है छल रहा है।

तुम्हारी ठोकरों के बीच आकर

बहुत टूटा हुआ हूँ, लुट गया हूँ

तेरा सम्मान खोकर, स्नेह खोकर

स्वयं ही बुझ चुका हूँ, घुट गया हूँ।

यहाँ हालात क्या से क्या हुआ है

नहीं कुछ सूझता…

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Added by आशीष यादव on June 1, 2019 at 5:02pm — No Comments

हम तुम, दो तट नदी के

हम तुम

दो तट नदी के

उद्गम से ही साथ रहें हैं

जलधारा के साथ बहे हैं

किन्तु हमारे किस्से कैसे, हिस्से कैसे

सबने देखा, सबने जाना,

रीति-कुरीति, रस्म-रिवाज, अपने-पराये

सब हमारे बीच आये

एक छोर तुम एक छोर मैं

इनकी बस हम दो ही सीमाएं

जब इनमे अलगाव हुआ दुराव हुआ

धर्म-जाति का भेदभाव हुआ

क्षेत्रवाद और ऊँच-नीच का पतितं आविर्भाव हुआ

तब हम तुम

इस जघन्य विस्तार से और दूर हुए

तब भी इन्हें हमने ही हदों…

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Added by आशीष यादव on April 1, 2017 at 1:30pm — 6 Comments

यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है

2122 2122 2122 212



पग सियासी आँच पर मधु भी जहर होने को है।

बच गया ईमान जो कुछ दर-ब-दर होने को है।।



मुफलिसों को छोड़कर गायों गधों पर आ गई।

यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है।।



उड़ रहा है जो हकीकत की धरा को छोड़ कर।

बेखबर वो जल्द ही अब बाखबर होने को है।।



वो जो बल खा के चलें इतरा के घूमें कू-ब-कू।

खत्म उनके हुस्न की भी दोपहर होने को है।।



जुल्म से घबरा के थक के हार के बैठो न तुम।

"हो भयावह रात कितनी भी सहर होने…

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Added by आशीष यादव on March 3, 2017 at 12:00pm — 18 Comments

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