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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Page

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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Dr. Vijai Shanker's blog post विसंगति —डॉo विजय शंकर
"आ. भाई विजय जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हम तो हल के दास ओ राजा-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. अमिता जी, गजल पर उपस्थिति व स्नेह के लिए आभार ।"
21 hours ago
amita tiwari commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हम तो हल के दास ओ राजा-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"पीता  हर  उम्मीद  हमारीकैसी तेरी प्यास ओ राजा बहुत उत्तम ,बहुत सटीक  गागर मे सागर । वाह बधाई "
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on amita tiwari's blog post दस वर्षीय का सवाल
"आ. अमिता जी, अच्छी व सीख देती रचना हुई है । प्रक्रिति भी निश्चित तौर पर दण्डित कर रही है कि कुछ चेतें । इस रचना पर हार्दिक बधाई ।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post आशा ......
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सुचिसंदीप अग्रवालl's blog post "करो उजागर प्रतिभा अपनी"
"आ. सुचिसंदीप जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

जो पेड़ शूल वाले थे-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ किस्मत कहें न कैसे सँवारी गयी बहुत हर दिन नजर हमारी उतारी गयी बहुत।१। * जो पेड़ शूल  वाले  थे  मट्ठे से सींचकर पत्थर को चोट फूल से मारी गयी बहुत।२। * भूले से अपनी ओर  न  आँखें उठाए वो जो शय बहुत बुरी थी दुलारी गयी बहुत।३। * धनवान मौका  मार  के  ऊँचा चढ़ा मगर निर्धन के हाथ आ के भी बारी गयी बहुत।४। * बेटी का ब्याह शान से करने को बिक गये ऐसे भी  बाजी  मान  की  हारी  गयी बहुत।५। * जिसको चुकाते थक गये लोगो के पाँव भी सुख  की  हमारे  गाँव  उधारी  गयी  बहुत।६। (६-४-२१) मौलिक अप्रकाशित लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"बहुत ही दुखद समाचार है..ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। "
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post सबसे बड़े डॉक्टर (लघुकथा): डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव
"आ. भाई गोपाल नारायण जी, सादर अभिवादन । अच्छी कथा हुई है । हार्दिक बधाई। "
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"दूसरी कथा को सामान्य पोस्ट में डालिएगा। उसका भी आनंद मिले। सादर.."
Apr 30
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आ. भाई ओमप्रकाश जी, अच्छी संदेशपरक रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Apr 30
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आ. बबीता बहन, अच्छी कथा हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Apr 30
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आ. भाई शेख शहजाद जी, सुन्दर और यथार्थपरक कथा हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Apr 30
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आ. सुचिसंदीप जी, सादर अभिवादन । इस बेहतरीन कथा के माध्यम से कोरोनाकाल में भी लूटखसोट करने वाले तमाम सक्षम लोगों के गाल पर करारा तमाचा जड़ा है । बहुत बहुत हार्दिक बधाई ।"
Apr 30
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आ. भाई मनन जी, बहुत खूबसूरत अंदाज में कपटी मनों टर चोट की है । बहुत बहुत बधाई।"
Apr 30
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post सवालों का ऐसे बता हल किधर है.
"आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । बेहतरीन गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Apr 30
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s blog post सायली (कोरोना)
"आ. भाई बासुदेव जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Apr 29
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post मानता हूँ तम गहन सरकार लेकिन-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व मनभावन प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Apr 29
बसंत कुमार शर्मा commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post मानता हूँ तम गहन सरकार लेकिन-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार  अत्यंत मार्मिक गज़ल हुई है, बधाई स्वीकारें "
Apr 29
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

मानता हूँ तम गहन सरकार लेकिन-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२ किसलिए भण्डार अपने भर रहे हो देश बेबस को  निवाला  कर रहे हो।१। * रंग पोते धर्म  का  बाहर से अपने आप केवल पाप के ही घर रहे हो।२। * निर्वसनता  चन्द  लोगों  को सुहाती इसलिए क्या चीर सब का हर रहे हो।३। * कत्ल का आदेश तुमने ही दिया जब खून के छींटों से क्योंकर  डर रहे हो।४। * व्यर्थ है  उम्मीद  पिघलोगे  कभी ये है पता  हर  जन्म  में  पत्थर रहे हो।५। * मानता हूँ तम गहन सरकार लेकिन क्यों चिताओं से उजाला कर रहे हो।६।मौलिक/अप्रकाशित लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'See More
Apr 29

Profile Information

Gender
Male
City State
Delhi
Native Place
Dharchaula,uttarakhand
Profession
teaching

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog

जो पेड़ शूल वाले थे-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२



किस्मत कहें न कैसे सँवारी गयी बहुत

हर दिन नजर हमारी उतारी गयी बहुत।१।

*

जो पेड़ शूल  वाले  थे  मट्ठे से सींचकर

पत्थर को चोट फूल से मारी गयी बहुत।२।

*

भूले से अपनी ओर  न  आँखें उठाए वो

जो शय बहुत बुरी थी दुलारी गयी बहुत।३।

*

धनवान मौका  मार  के  ऊँचा चढ़ा मगर

निर्धन के हाथ आ के भी बारी गयी बहुत।४।

*

बेटी का ब्याह शान से करने को बिक गये

ऐसे भी  बाजी  मान  की …

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Posted on May 1, 2021 at 9:25pm

मानता हूँ तम गहन सरकार लेकिन-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२



किसलिए भण्डार अपने भर रहे हो

देश बेबस को  निवाला  कर रहे हो।१।

*

रंग पोते धर्म  का  बाहर से अपने

आप केवल पाप के ही घर रहे हो।२।

*

निर्वसनता  चन्द  लोगों  को सुहाती

इसलिए क्या चीर सब का हर रहे हो।३।

*

कत्ल का आदेश तुमने ही दिया जब

खून के छींटों से क्योंकर  डर रहे हो।४।

*

व्यर्थ है  उम्मीद  पिघलोगे  कभी ये

है पता  हर  जन्म  में  पत्थर…

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Posted on April 29, 2021 at 5:40am — 2 Comments

अब हो गये हैं आँख वो भूखे से गिद्ध की- लक्ष्मण धामी'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

चिन्ता करें जो आम की शासन नहीं रहे

कारण इसी के लाखों के जीवन नहीं रहे।१।

*

हर कोई खेल सकता है पैसों के जोर पर

कानून  आज  देश  में  बन्धन  नहीं  रहे।२।

*

अब हो गये हैं आँख वो भूखे से गिद्ध की

जो थे  बचाते  लाज  को  यौवन नहीं रहे।३।

*

आई हवा नगर की  तो दीवारें बन गयीं

मिलजुल जहाँ थे बैठते आगन नहीं रहे।४।

*

जीवन का दर्द आँखों में उनकी रहा जवाँ

बेवा हो जिनके  हाथों  में  कंगन नहीं रहे।५।

*

तकनीक…

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Posted on April 26, 2021 at 12:48pm — 1 Comment

कालिख लगी है इनमें जो -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल )

२२१/२१२१/१२२१/२१२



हमने किसी को हर्ष का इक पल नहीं दिया

सूखी धरा को  जैसे  कि  बादल  नहीं दिया।१।

*

रूठे तो उससे रोज ही लेकिन मनाया कब

आँसू ढले जो आँखों से आँचल नहीं दिया।२।

*

गंगा से  भर  के  लाये  थे  पुरखों  को तारने

जलते वनों की प्यास को वो जल नहीं दिया।३।

*

कहने पे मन को आपके बंदिश में क्यों रखें

यूँ जब किसी भी द्वार को साँकल नहीं दिया।४।

*

कालिख लगी है इनमें जो सौगात जग की है

आँखों में हम ने एक  भी  काजल नहीं…

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Posted on April 25, 2021 at 12:36pm — 4 Comments

Comment Wall (20 comments)

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At 8:45am on January 16, 2021, Aazi Tamaam said…

मुसाफिर सर प्रणाम स्वीकार करें आपकी ग़ज़लें दिल छू लेती हैं

At 8:39pm on December 3, 2020,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

जन्मदिन की शुभकामनाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी 

At 11:39pm on November 22, 2020, DR ARUN KUMAR SHASTRI said…

प्रिय भ्राता धामी जी सप्रेम नमन
आपके शब्द सहरा में नखलिस्तान जैसे - हैं

At 8:37am on May 14, 2020, Om Prakash Agrawal said…
आदरणीय
सराहना हेतु सहृदय आभार एवं धन्यवाद
At 4:12pm on May 7, 2020, सालिक गणवीर said…
हौसला अफजाई के लिए आपका ममनून हूँ आदरणीय
At 10:58am on October 18, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बहुत शुक्रिया
At 2:30pm on September 28, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय लक्ष्मण धामी ' मुसाफिर' जी बहुत बहुत शुक्रिया हौसला अफ़जाई का आपने समय निकाला मैं बहुत शुक्रगुज़ार हूँ
At 10:47am on August 24, 2019, dandpani nahak said…
बहुत शुक्रिया आदरणीय लक्षमण धामी जी
At 10:03pm on May 24, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी आदाब
बहुत बहुत शुक्रिया हौसला बढ़ने के लिए!
At 4:04pm on August 8, 2018, babita garg said…

शुक्रिया लक्ष्मण जी

 
 
 

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"हा हा हा। बहुत मस्त कविता। उत्तम हास्य"
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