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dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आ गए बस दे के अपनी जान का नज़राना हम वो थे गोया शम'अ कोई और ज्यूँ परवान: हम तोड़ देते उससे कैसे इक भी पल याराना हम दे चुके थे इश्क़ में दिल का जिसे बैआन: हम अब हमारी ज़िन्दगी भी इस क़दर वीरान है जैसे ढहती इक हवेली उसका हों तह-ख़ाना हम ज़िन्दगी ने…"
Thursday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदरणीय दिनेश कुमार विश्वकर्मा जी नमस्कार बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें "
Thursday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदरणीया रोज़ीना दिघे जी बहुत शुक्रिया आपका "
Jul 29
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"परम आदरणीय समर कबीर साहब प्रणाम! बहुत-बहुत  शुक्रिया आपके अमूल्य इस्लाह के लिए सुधार कर  पोस्ट करता हूँ कृपा बनाये रखें "
Jul 29
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदरणीय सालिक गणवीर जी नमस्कार बहुत-बहुत शुक्रिया आपका आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आये उसे सराहा बहुत शुक्रिया आदरणीय "
Jul 29
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"जी बहुत-बहुत शुक्रिया परम आदरणीय समर कबीर साहब!"
Jul 29
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"परम आदरणीय समर कबीर साहब प्रणाम! ग़ज़ल को उपयुक्त समय न दें पाने की मुआफ़ी मांगते हुए आपका बहुत शुक्रगुज़ार हूँ आपने वक़्त निकाला! आपकी इस्लाह के अनुसार ग़ज़ल पोस्ट करता हूँ जाहिर है दूसरा शैर नहीं होगा!बहुत-बहुत शुक्रिया हमेशा कृपा बनाये रखें "
Jul 29
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर ' साहब आदाब बहुत शुक्रिया स्पष्ट करने के लिए की शाहान: अंदाज़ हुआ करते हैं हरकतें बचकाना के साथ ही ज़ेब देती हैं मैं स्वीकार करता हूँ सादर "
Jul 29
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहब आदाब बहुत-बहुत शुक्रिया आपका अपना वक़्त निकाल कर ग़ज़ल तक आये उसे सराहा और हौसला अफ़ज़ाई की आभारी हूँ आपका तीन मतले होना और मक़्ता न होना कोई ऐब है इस नहीं मुआफ़ी चाहता हूँ की इसका मुझे इल्म नहीं था हाँ 'बचकाना…"
Jul 29
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदरणीया ऋचा यादव जी नमस्कार बहुत-बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आयीं औ  उसे सराहा बाकि 2रे और 3रे शैर के सम्बन्ध में मैंने स्पष्ट करने की कोशिश की है आपको राय का स्वागत है "
Jul 29
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर '  जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आप ग़ज़ल तक आये उसे सराहा ह्रदय से धन्यवाद 2रे शैर के सानी को अगर इस तरह पढ़ा जाय "इश्क़ में करते रहे जो हरकतें शाहाना हम " तो क्या यह शैर सहीह होगा कृपया राय…"
Jul 29
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदरणीय आज़ी तमाम जी सादर अभिवादन अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें पाँचवा शैर क्या खूब हुआ है वाह बहुत-बहुत बधाई "
Jul 29
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आ गए बस दे के अपनी जान का नज़राना हम वो कि गोया कोई शम्मा और ज्यूँ परवाना हम उनको लगता था हुए हैं बेवज़ह दीवाना हम इश्क़ में करते रहे जो हरकतें बचकाना हम तोड़ देते उससे कैसे इक भी पल याराना हम दे चुके थे इश्क़ में दिल का जिसे बैआना हम अब हमारी ज़िन्दगी…"
Jul 29
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदरणीया दीपांजलि दुबे जी नमस्कार ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है हार्दिक बधाई स्वीकार करें "
Jul 28
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदरणीया राजेश कुमारी दी साहिबा प्रणाम उम्द: ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें मतला खूब हुआ है सभी शैर बहुत खूब हुए हैं बहुत बहुत बधाई "
Jul 28
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहब आदाब उम्द:ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें मतला बहुत खूब हुआ है और मक़्ता भी वाह! सभी शैर बहुत अच्छे हुए हैं बहुत बहुत बधाई "
Jul 28

Profile Information

Gender
Male
City State
arang
Native Place
arang
Profession
service

Dandpani nahak's Blog

ग़ज़ल 2122 1212 22

इश्क़ से ना हो राब्ता कोई
ज़िन्दगी है की हादसा कोई

वो पुराने ज़माने की बात है
अब नहीं करता है वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने
मौत का है न फ़लसफ़ा कोई

यहाँ सब बे अदब हैं मेरी जां
अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का है टूटने का ग़म 'नाहक'
था सलामत मुआहिदा कोई

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on September 27, 2020 at 6:02pm — 13 Comments

ग़ज़ल 2122 1212 22

इश्क़ हो या कि हादसा कोई
सब का होता है कायदा कोई

वो पुराने ज़माने कि बात हैं
अब नहीं करता हैं वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने
मौत का हैं न फ़लसफ़ा कोई

सब यहाँ बे अदब हैं मेरी जां
अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का हैं टूटने का ग़म 'नाहक'
था सलामत मुआहिदा कोई


मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on April 9, 2020 at 2:17am

122 122 122 12 ग़ज़ल

कभी इस तरह से भी सोचा है क्या
भला ज़िन्दगी का भरोसा है क्या

यूँ रहता है जैसे यहाँ सदियों तक
रहेगा मगर ये तो धोका है क्या

नकाबों में दिल्ली है सरकारें दो
अजीबो गरीब ये तमाशा है क्या

अगर ना सियासत हो दिल्ली में तो
तभी कुछ किया जा भी सकता है क्या

दिवाली मनाई है दिल्ली ने भी
खुदा ने दिवाला निकाला है क्या

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on November 3, 2019 at 11:41pm — 1 Comment

इस दीवाली

इस दीवाली सिर्फ दीये मत जलाना तुम

बनकर प्रकाश अँधेरे में उतर जाना तुम



देखना कहीं कोई मासूम

बुझी फुलझड़ियों में गुमसुम

चिंगारी ढूंढ रहा हो तो

उसके पास जाना तुम



रौशन कर दुनिया उसको गले लगाना तुम

इस दीवाली सिर्फ दीये मत जलाना तुम



और देखना घर की झुर्रियाँ सभी

दूर कर के दिलों की दूरियाँ सभी

साथ मिलके सब अपनों के

एक एक कर जलाना मजबूरियाँ सभी



एकता में बल है कितना ये बताना तुम

इस दीवाली सिर्फ दीये मत जलाना… Continue

Posted on October 27, 2019 at 4:24pm — 8 Comments

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At 6:03pm on March 29, 2020, सालिक गणवीर said…
आदरणीय नाहक जी
बहुत आभार है आपका. मैं कोशिश करूंगा कि भविष्य में और भी बेहतर लिख संकू.
At 10:32am on August 7, 2019, Samar kabeer said…

नाहक़ जी,प्रयासरत रहें ।

At 11:31pm on January 26, 2019, Samar kabeer said…

प्रयासरत रहें ।

At 10:27am on January 25, 2019, Samar kabeer said…

जनाब नाहक़ साहिब आदाब,

कृपया ये ग़ज़ल मुझे वाट्सऐप कर दें, मेरा नम्बर है 09753845522

At 8:06pm on December 15, 2017, dandpani nahak said…
122 122 122 122
हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं

निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया
हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं

जिन्होनें हमें लूटना नाहिं छोड़ा
उन्हें क्या बताएं उन्हीं के धड़े हैं

तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं

हमें जी हजूरी नहीं 'शौक' जाओ
तुम्हारे लिए ही नहीं हम बनें हैं

दण्डपाणि नाहक 'शौक'

मौलिक अप्रकाशित
 
 
 

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