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बृजेश कुमार 'ब्रज'
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"वाह...आपका सुझाव बहुत ही खूबसूरत है आदरणीय नीलेश जी किनारा हो नहीं सकता कभी मझधार के क़ाबिल "
5 hours ago
Nilesh Shevgaonkar commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"आ. बृजेश जी  जरा सा मसअला है ये नही तकरार के क़ाबिल... तकरार के क़ाबिल नहीं है तो अच्छा ही हुआ न ..क्यूँ कि तक्रार तो मतान्तर से उपजती है .चलो माना नहीं हूँ मैं तुम्हारे प्यार के क़ाबिकिनारा हो नहीं सकता कभी मझधार के क़ाबिल "
5 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"जी बिल्कुल...आप लोगों की तीखी बहस में भी काफी कुछ सीखने को ही मिलता है।"
5 hours ago
Nilesh Shevgaonkar commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"आ. बृजेश जी, आप तो आप .. मैं भी अक्सर समर सर के सानिध्य में सीखता हूँ.. कई बार तीखी बहस भी हो जाती है लेकिन यदि उनका पॉइंट वैलिड है तो माँ लेता हूँ..मेरी पिछली ग़ज़ल में मैंने एक शब्द लिया था मियाद ..जो बहुत ही आम फ़हम व प्रचलित शब्द है लेकिन समर…"
5 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"ऐसे कहता हूँ जरा सा मसअला है ये नही तकरार के क़ाबिल चलो माना नहीं हूँ मैं तुम्हारे प्यार के क़ाबिल"
5 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"उचित है आदरणीय नीलेश जी...ये सच है कि साहित्य में मेरी जानकारी बहुत ही अल्प है...बस कुछ कहना चाहता हूँ सो भावों को शब्दों का रूप देने की कोशिश करता हूँ...इसलिए थोड़ी बहुत जानकारी ओ बी ओ जैसे प्लेटफॉर्म से आप लोगों के सानिध्य में प्राप्त हुई है।और…"
5 hours ago
Nilesh Shevgaonkar commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"आप मुद्द आ का उर्दू रूप देखें .. مدعا  मीम , दाल , ऐन मिलकर मुद्द और बाद का अलिफ़ आ बना रहे हैं  दिल मुद्दई' ओ दीदा  बना मुद्दा-अलैह २२१ २ १२ १ १ २    २ १ २ १२ बोल्ड २१२ मुद्द…"
8 hours ago
Nilesh Shevgaonkar commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"आ. बृजेश जी,मुद्दआ को आम बोलचाल में मुद्दा ही पढ़ा जाने लगा है लेकिन साहित्य में लिखते समय शुद्ध रूप मुद्दआ लिखना ही श्रेयस्कर होगा.आप ने फ़ानी साहब का जो शे'र पेश किया है उस की तक्तीअ करें तो पाएँगे कि वहां भी मुद्द आ ए हयात पढ़ा गया है ..यही हाल…"
8 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"आदरणीय नीलेश जी...आपने एक बारीक कमी की ओर ध्यान दिलाया है...उसके लिए हार्दिक धन्यवाद।दरअसल हम जैसे लोग जो रोजमर्रा में बोलते हैं उसे ही सही मान बैठते हैं।हालाँकि सुधार किया जा सकता है लेकिन इस शब्द को लेकर थोड़ा संशय है। रेख़्ता शब्दकोश,हिंदवी,और…"
Monday
Nilesh Shevgaonkar commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"आ. बृजेश जी,मुद्दा नहीं मुद्दआ होता है अत: आप मतला पुन: कहें . मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ काश पूछो कि मुद्दआ' क्या है,,, ग़ालिब  सादर "
Monday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-हमारे आँसू
"स्वागत संग आभार आदरणीय धामी जी..."
Saturday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"बहुत बहुत आभार आदरणीय धामी जी...सादर"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-हमारे आँसू
"आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
Friday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन। खूबसूरत गजल हुई है । हार्दिक बधाई।"
Thursday
बृजेश कुमार 'ब्रज' posted a blog post

ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल

1222 1222 1222 1222जरा सी बात ये मुद्दा नहीं तकरार के क़ाबिल चलो माना नहीं हूँ मैं तुम्हारे प्यार के क़ाबिलन ये संसार है मेरे किसी भी काम का हमदम नहीं हूँ मैं किसी भी तौर से संसार के क़ाबिलन मेरी पीर है ऐसी जिसे दिल में रखे कोई न मेरी भावनायें हैं किसी आभार के क़ाबिलये मुमकिन है ज़माने में हंसी तुझसे ज़ियादा हों सिवा तेरे नहीं कोई मेरे अश'आर के क़ाबिलमेरे आँसू तुम्हारी आँखों से बहते तो अच्छा था मगर ये अश्क़ भी तो हों तेरे रुख़सार के क़ाबिलन जाने क्यों बहारें इस कदर से रूठ कर बैठीं नहीं तो ज़ीस्त थी 'ब्रज'…See More
Nov 25
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की - क्या ही तुझ में ऐब निकालूँ क्या ही तुझ पर वार करूँ
"चन्दन हूँ तो अक्सर मुझ से काले नाग लिपटते है मैं भी शिव सा भोला भाला सब को गले का हार करूँ. वाह आदरणीय क्या ही खूब कहा..."
Nov 15

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Male
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noida
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jhansi

बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog

ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल

1222 1222 1222 1222

जरा सी बात ये मुद्दा नहीं तकरार के क़ाबिल

चलो माना नहीं हूँ मैं तुम्हारे प्यार के क़ाबिल

न ये संसार है मेरे किसी भी काम का हमदम

नहीं हूँ मैं किसी भी तौर से संसार के क़ाबिल

न मेरी पीर है ऐसी जिसे दिल में रखे कोई

न मेरी भावनायें हैं किसी आभार के क़ाबिल

ये मुमकिन है ज़माने में हंसी तुझसे ज़ियादा हों

सिवा तेरे नहीं कोई मेरे अश'आर के क़ाबिल

मेरे आँसू तुम्हारी आँखों से बहते तो अच्छा था

मगर ये अश्क़ भी तो हों तेरे रुख़सार के…

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Posted on November 25, 2021 at 12:18pm — 12 Comments

ग़ज़ल-हमारे आँसू

2122      1122      1122       22
खोजने  जाऊँ कहाँ  जान से प्यारे  आँसू

ढल गये  आँख  से  चुपचाप हमारे  आँसू


इस तरह  देख सकूँगा न बिखरते  इनको

कितना टूटे हैं तो आँखों  में  सँवारे  आँसू



शब अँधेरी  है हवा  सर्द  तसव्वुर  उनका

याद  मीठी  है  बड़ी  और  हैं खारे  आँसू



मुझको भाती नहीं ये बोलती पुरनम आँखें

काश  आँखों से  चुरा लूँ  मैं  तुम्हारे  आँसू…

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Posted on November 7, 2021 at 4:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल-रो पड़ेगा....बृजेश कुमार 'ब्रज'

1222     1222      122   

मिलेगा और  मिल  कर रो पड़ेगा

मुझे  देखेगा  तो  घर  रो  पड़ेगा



न जाने क्यों कहाँ खोया रहा हूँ

मेरी  आहट पे ही दर   रो पड़ेगा



मुझे  वो  भूल  जाने  के  लिये ही

करेगा  याद  अक़्सर  रो  पड़ेगा



हँसी मुस्कान होंठों  पे  सजाकर

कोई  इंसान  अंदर  रो  पड़ेगा



भले  ही  मौत  दे  देगा  मुझे पर

वो क़ातिल और खंज़र रो पड़ेगा



तुम्हारी आँख  से आँसू बहे गर

यहाँ  'ब्रज' में समंदर रो…
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Posted on October 5, 2021 at 3:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल-गलियों में सन्नाटा पसरा शमशानों में शोर

बह्र-ए-मीर

मुद्दत से वीरान पड़े इस उजड़े खंडर की

अब कौन करे परवाह जहाँ में दीदा-ए-तर की

गलियों में सन्नाटा पसरा शमशानों में शोर

आँखों को उम्मीद नहीं थी ऐसे मंज़र की

पास तुम्हारे बढ़ने लगता है जब कोलाहल

याद बड़ी तब आती है अपने सूने घर की

मिलकर मंज़िल पा लेंगे कब ऐसा बोला था

लेकिन तैयारी करते दोनों एक सफ़र की

अक्सर दरवाजे पे आ 'ब्रज' ने राह निहारी

इक दिन तो चिट्ठी आयेगी मेरे दिलबर की

अन्दर के खालीपन से डर डर के घबरा के

'ब्रज' आया…

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Posted on August 26, 2021 at 8:06pm — 6 Comments

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At 6:59pm on October 24, 2017, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

स्वागत है आदरणीय ,  आपको मित्र के रूप में पाना मेरा सौभाग्य है .

At 11:43pm on November 17, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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