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Usha Awasthi
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Monday
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कुछ उक्तियाँ

पृथ्वी सम्हलती नहींमंगल सम्हालेंगेयहाँ ऑक्सीजन नष्ट कीवहाँ डेरा डालेंगेबहुत मनाईं देवियाँबहुत मनाए देवकर्म-लेख मिटता कहाँ ?भाग्य लिखा सो होयबुज़ुर्ग बेमिसाल होते हैंसमस्त जीवन के अनुभवों कीअलिखित किताब होते हैंबुज़ुर्ग बेमिसाल होते हैंमौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Monday
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Apr 29
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आतंकी कोरोना

कौन आँसू पोंछे , कौन सान्त्वना दे ?स्वजन की मौत पर अकेले ही रोए हैंआतंकी कोरोना के, मुश्किल हालातों मेंस्वयं सांत्वना दी , स्वयं नेत्रनीर धोए हैंना ही चेहरा देखा , ना मरघट जा पाएकैसी विडम्बना ; जो मन को झुलसाएसंचित स्मृतियों को , प्रेमपूर्ण भाव मेंसजा लिया है अपने अन्तर के गाँव में मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Apr 29
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post बलि नित्य चढ़ाई जाती है
"आ0 लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी , हार्दिक धन्यवाद आपको"
Apr 27
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post बलि नित्य चढ़ाई जाती है
"आ. ऊषा जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Apr 27
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post बलि नित्य चढ़ाई जाती है
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर ' साहेब, रचना पसंद आने हेतु हार्दिक शुक्रिया आपका"
Apr 25
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Usha Awasthi's blog post बलि नित्य चढ़ाई जाती है
"मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब, सम-सामयिक अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें। सादर। "
Apr 25
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Apr 24
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Apr 24
Usha Awasthi posted a blog post

बलि नित्य चढ़ाई जाती है

आशाओं , आकांक्षाओं कीजीवन की और प्रतिभाओं कीइस लोकतन्त्र के मन्दिर मेंबलि नित्य चढ़ाई जाती हैकोरोना की महमारी मेंत्रासद स्थिति, लाचारी मेंलाशों पर राजनीति करकेजनता भरमाई जाती हैजिस समय मुसीबत ने घेराचँहु ओर काल का है डेरावीभत्स घड़ी में आन्दोलनरैली करवाई जाती हैनज़रें गड़ाए सब वोटों परटिकती निगाह बस नोटों परशासन में भागीदारी कीकामना जगाई जाती हैइस लोकतन्त्र के मन्दिर मेंबलि नित्य चढ़ाई जाती हैमौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Apr 24
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post कुछ उक्तियाँ
"आ0 सुशील सरन जी , हार्दिक आभार आपका"
Apr 20
Sushil Sarna commented on Usha Awasthi's blog post कुछ उक्तियाँ
"वाह भावपूर्ण प्रस्तुति आदरणीया ऊषा जी । हार्दिक बधाई"
Apr 20
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post कुछ उक्तियाँ
"हार्दिक धन्यवाद आपको, लक्ष्मण धामी जी, सादर"
Apr 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post कुछ उक्तियाँ
"आ. ऊषा जी, अच्छी प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई।"
Apr 17
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Apr 16

Profile Information

Gender
Female
City State
Lucknow
Native Place
Uttar Pradesh
Profession
Author

ब्राहम्ण

उषा अवस्थी

मान दिया होता यदि तुमने
ब्राम्हण को , सुविचारों को
सदगुण की तलवार काटती
निर्लज्जी व्यभिचारों को

उसको काया मत समझो ,
ज्ञान विज्ञान समन्वय है
द्वैत भाव से मुक्त, जितेन्द्रिय
सत्यप्रतिज्ञ , समुच्चय है

कर्म , वचन , मन से पावन
वह ब्रम्हपथी , समदर्शी है
नहीं जन्म से , सतत कर्म से
तेजस्वी , ब्रम्हर्षि है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Usha Awasthi's Blog

कुछ उक्तियाँ

पृथ्वी सम्हलती नहीं

मंगल सम्हालेंगे

यहाँ ऑक्सीजन नष्ट की

वहाँ डेरा डालेंगे

बहुत मनाईं देवियाँ

बहुत मनाए देव

कर्म-लेख मिटता कहाँ ?

भाग्य लिखा सो होय

बुज़ुर्ग बेमिसाल होते हैं

समस्त जीवन के अनुभवों की

अलिखित किताब होते हैं

बुज़ुर्ग बेमिसाल होते हैं

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on May 3, 2021 at 8:04pm

आतंकी कोरोना

कौन आँसू पोंछे , कौन सान्त्वना दे ?

स्वजन की मौत पर अकेले ही रोए हैं

आतंकी कोरोना के, मुश्किल हालातों में

स्वयं सांत्वना दी , स्वयं नेत्रनीर धोए हैं

ना ही चेहरा देखा , ना मरघट जा पाए

कैसी विडम्बना ; जो मन को झुलसाए

संचित स्मृतियों को , प्रेमपूर्ण भाव में

सजा लिया है अपने अन्तर के गाँव में 

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on April 28, 2021 at 4:00pm

बलि नित्य चढ़ाई जाती है

आशाओं , आकांक्षाओं की

जीवन की और प्रतिभाओं की

इस लोकतन्त्र के मन्दिर में

बलि नित्य चढ़ाई जाती है

कोरोना की महमारी में

त्रासद स्थिति, लाचारी में

लाशों पर राजनीति करके

जनता भरमाई जाती है

जिस समय मुसीबत ने घेरा

चँहु ओर काल का है डेरा

वीभत्स घड़ी में आन्दोलन

रैली करवाई जाती है

नज़रें गड़ाए सब वोटों पर

टिकती निगाह बस नोटों पर

शासन में भागीदारी की

कामना जगाई जाती…

Continue

Posted on April 24, 2021 at 9:47am — 4 Comments

कुछ उक्तियाँ

कैसी फ़ितरत के लोग होते हैं ?

दूसरे की आँखों में धूल झोंकने हेतु

नम्बर वही मोबाइल पर

नाम कुछ और जोड़ लेते हैं

दुर्जनों के दुर्वचन

सहिष्णुता की परख होते हैं

अपनी नहीं खुद उनकी

औक़ात बता देते हैं

उनकी माँ नहीं थीं, मेरे पिता

वे मुझमें माँ ढूँढते रहे,मैं उनमें पिता

उन्हे ना माँ मिलीं, ना मुझे पिता

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on April 16, 2021 at 10:43am — 4 Comments

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At 6:29am on August 5, 2018, Kishorekant said…

सुन्दर रचना केलिये हार्दिक अभिनंदन सुश्री उषा अवस्थिजी ।

At 9:01pm on September 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए....

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है.

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