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Sushil Sarna
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Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post राखी पर कुछ दोहे. . . .
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । रक्षा बंधन की हार्दिक बधाई सर"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post राखी पर कुछ दोहे. . . .
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुन्दर दोहे हुए है। हार्दिक बधाई।"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

राखी पर कुछ दोहे. . . .

राखी पर कुछ दोहे. . . .भाई बहिन के प्यार का, राखी है त्योहार ।पावन धागों में छुपी , बहना की मनुहार ।।बहना भेजे डाक से, भाई को सन्देश ।राखी भैया बाँधना, मैं बैठी परदेश ।।रंग बिरंगी राखियाँ, रिश्तों का संसार । धागों में है छुपी हुई, बहना की मनुहार  ।।राखी ले कर भ्रात के, बहना आई द्वार ।तिलक लगाती माथ पर, देती दुआ हजार ।।बहना चाहे भ्रात का, सुखी रहे परिवार । रिश्तों में चलती रहे, मीठी मधुर बयार ।।धागे राखी के बड़े, होते हैं अनमोल । इस रिश्ते के प्यार को, दौलत में मत तोल ।।बहना भी लाचार है, बाबुल भी…See More
Thursday
Sushil Sarna and Anita Maurya are now friends
Thursday
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गीत रीते वादों का. . . . .

गीत रीते वादों का ......मैं गीत हूँ  रीते  वादों  का , मैं  गीत हूँ  बीती  रातों  का।जो मीत से कुछ भी कह न सका,वो गीत हूँ मैं बरसातों का ।          हर मौसम ने उस मौसम  की          बरसातों  को   दहकाया   है ,           बीत गया वो मौसम दिल का          लौट के फिर  कब  आया  है ,जश्न  मनाता हूँ  मैं  अपनी , भीगी  हुई  मुलाकातों  का ।जो मीत से कुछ भी कह न सका,वो गीत हूँ मैं बरसातों का ।            कैसे अपने  स्वप्न  मिटा  दूँ             कैसे दिल से उसे  भुला  दूँ ,             मौन हृदय के मन दर्पण…See More
Jul 28
Sushil Sarna commented on Anita Maurya's blog post आँसू
"वाह बहुत खूबसूरत गजल बनी है आदरणीया जी । हार्दिक बधाई आदरणीया जी"
Jul 18
Sushil Sarna commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post एक दिन आ‍ँसू पीने पर भी टैक्स लगेगा (ग़ज़ल)
"वाह आदरणीय बहुत सुंदर प्रस्तुति हुई है ।हार्दिक बधाई सर"
Jul 18
Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post करो जुर्म जमकर ये अन्धेर नगरी-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"वाह आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बहुत सुंदर प्रस्तुति सर हार्दिक बधाई सर"
Jul 18
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दोहा त्रयी -फूल

दोहा त्रयी : फूलकागज के ये फूल कब, देते कोई गंध  ।भौंरों को भाता नहीं, आभासी मकरंद  ।।इस नकली मकरंद पर, मौन मधुप गुंजार ।अब कागज के फूल से, गुलशन है गुलज़ार ।।अब कागज के पुष्प दें, प्रीतम को उपहार ।मुरझाता नकली नहीं, फूलों का संसार ।।सुशील सरना / 15-7-22मौलिक एवं अप्रकाशित See More
Jul 15
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दोहा मुक्तक : गाँव ....

मुक्तक : गाँव .....मिट्टी का घर  ढूँढते, भटक  रहे  हैं  पाँव। कहाँ गई पगडंडियाँ, कहाँ गए वो  गाँव । पीपल बूढ़ा हो गया, मौन हुए सब  कूप - काली सड़कों पर हुई, दुर्लभ ठंडी छाँव ।                   ******* कच्चे घर  पक्के  हुए, बदल  गया  परिवेश । छीन लिया हल बैल का, यंत्रों  ने अब देश । बदले- बदले अब लगें , भोर साँझ  के  रंग  - वर्तमान  में  गाँव  का, बदल  गया  है  पेश । (पेश =रूप, आकार )                      ******** गाँवों ने भी ले लिया , अब शहरों का रूप । हरियाली ओझल हुई , लुप्त हुए सब कूप ।…See More
Jul 12
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post बुढ़ापा .....
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय"
Jul 9
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post बुढ़ापा .....
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुन्दर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Jul 8
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बुढ़ापा .....

बुढ़ापा ....तन पर दस्तक दे रही, जरा काल की शाम । काया को भाने लगा, अच्छा  अब  आराम ।1।बीते कल की आज हम, कहलाते हैं शान । शान बुढ़ापे की हुई, अपनों से अंजान ।2।झुर्री-झुर्री पर लिखा, जीवन का संघर्ष । जरा अवस्था देखती ,मुड़ कर बीते वर्ष ।3।देख बुढ़ापा हो गया, चिन्तित क्यों इंसान । शायद उसको हो गया, अन्तिम पल का भान ।4।काया में कम्पन बढी , दृष्टि हुई मजबूर । अपनों से अपने हुए, जरा काल में दूर ।5।लघु शंका बस में नहीं, मुँह से गिरती लार । जरा अवस्था को मिला, तानों से शृंगार ।6।बूढ़ी काया के सभी, टूट…See More
Jul 8
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा मुक्तक .....
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर"
Jul 8
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post बुढ़ापा .....
"आदरणीय दयाराम जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार"
Jul 8
Dayaram Methani commented on Sushil Sarna's blog post बुढ़ापा .....
"आदरणीय सुशील सरना जी, बुढ़ापे पर अति सुंदर सृजन के लिए बधाई।"
Jul 6

Profile Information

Gender
Male
City State
Jaipur-Rajasthan
Native Place
New Delhi
Profession
Retired from Central Govt.Service as Superintending Officer
About me
I am a simple,sentimental and transparent person.Poetry is my hobby and passion

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राखी पर कुछ दोहे. . . .

राखी पर कुछ दोहे. . . .

भाई बहिन के प्यार का, राखी है त्योहार ।

पावन धागों में छुपी , बहना की मनुहार ।।

बहना भेजे डाक से, भाई को सन्देश ।

राखी भैया बाँधना, मैं बैठी परदेश ।।

रंग बिरंगी राखियाँ, रिश्तों का संसार ।

धागों में है छुपी हुई, बहना की मनुहार  ।।

राखी ले कर भ्रात के, बहना आई द्वार ।

तिलक लगाती माथ पर, देती दुआ हजार ।।

बहना चाहे भ्रात का, सुखी रहे परिवार ।

रिश्तों में चलती रहे, मीठी मधुर…

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Posted on August 11, 2022 at 1:02pm — 2 Comments

गीत रीते वादों का. . . . .

गीत रीते वादों का ......

मैं गीत हूँ  रीते  वादों  का , मैं  गीत हूँ  बीती  रातों  का।

जो मीत से कुछ भी कह न सका,वो गीत हूँ मैं बरसातों का ।

          हर मौसम ने उस मौसम  की

          बरसातों  को   दहकाया   है ,

          बीत गया वो मौसम दिल का

          लौट के फिर  कब  आया  है ,

जश्न  मनाता हूँ  मैं  अपनी , भीगी  हुई  मुलाकातों  का ।

जो मीत से कुछ भी कह न सका,वो गीत हूँ मैं बरसातों का ।

            कैसे अपने  स्वप्न  मिटा  दूँ…

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Posted on July 27, 2022 at 3:01pm

दोहा त्रयी -फूल

दोहा त्रयी : फूल

कागज के ये फूल कब, देते कोई गंध  ।
भौंरों को भाता नहीं, आभासी मकरंद  ।।

इस नकली मकरंद पर, मौन मधुप गुंजार ।
अब कागज के फूल से, गुलशन है गुलज़ार ।।

अब कागज के पुष्प दें, प्रीतम को उपहार ।
मुरझाता नकली नहीं, फूलों का संसार ।।

सुशील सरना / 15-7-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Posted on July 15, 2022 at 3:17pm

दोहा मुक्तक : गाँव ....

मुक्तक : गाँव .....

मिट्टी का घर  ढूँढते, भटक  रहे  हैं  पाँव।

कहाँ गई पगडंडियाँ, कहाँ गए वो  गाँव ।

पीपल बूढ़ा हो गया, मौन हुए सब  कूप -

काली सड़कों पर हुई, दुर्लभ ठंडी छाँव ।

                  *******

कच्चे घर  पक्के  हुए, बदल  गया  परिवेश ।

छीन लिया हल बैल का, यंत्रों  ने अब देश ।

बदले- बदले अब लगें , भोर साँझ  के  रंग  -

वर्तमान  में  गाँव  का, बदल  गया  है  पेश ।

(पेश =रूप, आकार )

                     ********

गाँवों…

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Posted on July 11, 2022 at 1:00pm

Comment Wall (35 comments)

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At 9:12pm on August 13, 2021, Om Parkash Sharma said…

आदरणीय सुशील सरना जी ,

सादर अभिवादन , आपके नाम और सावन पर लिखे सभी दोहे मन मोह गए । दोनों कविताएं 'मौसम को' व प्रश्न गंभीर भावों को लिए हुए है। साधुवाद । 

At 11:15pm on September 17, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय सुशील सरना जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी "कविता : कितना अच्छा होता" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |
आपको प्रसस्ति पत्र यथा शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 1:35am on May 6, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका मेल बॉक्स ब्लॉक होने के कारण मेल सेंड नहीं हो रहा है. 

At 1:29am on May 6, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय सुशील सरना सर, विलम्ब से प्रत्युत्तर हेतु क्षमा. आपको मेल कर दिया है. सादर 

At 10:17pm on April 7, 2016, केवल प्रसाद 'सत्यम' said…

आ० सरना भाई जी, सादर  प्रणाम!

आपका हार्दिक स्वागत है.  मित्रता से भाग्योदय होता है ,  मैं धन्य हुआ. सादर

At 9:46am on April 1, 2016, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय सुशील जी ..महीने का सक्रिय सदस्य चुने जाने पर मेरी तरफ से हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

At 6:02am on March 20, 2016, केवल प्रसाद 'सत्यम' said…

आ०  सुशील सरना भाई जी, सादर प्रणाम!  आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" चुने जाने पर बहुत-बहुत बधाई. सादर

At 4:22pm on March 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

सुशील सरना जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 9:00pm on February 17, 2016, Tasdiq Ahmed Khan said…

मोहतरम जनाब सुशील सरना  साहिब ,  यह  आप सब की हौसला अफ़ज़ाई का नतीजा है  , जिसके लिए   आप का बहुत बहुत शुक्रिया ,महरबानी

At 8:47pm on January 11, 2016, सतविन्द्र कुमार राणा said…
धन्यवाद आदरणीय sushil Sarna जी।आपको भी सपरिवार सादर हार्दिक शुभकामनाएं!
 
 
 

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