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Sheikh Shahzad Usmani
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  • SHIVPURI M.P.
  • India
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Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"आदाब। रचना पटल पर समय देकर त्वरित महत्वपूर्ण टिप्पणी हेतु शुक्रिया आदरणीय सर जी। जी, सही शब्द पकड़े आपने। लेकिन मेरे विचार से केवल उस वाक्यांश के बजाय सान्ता जी के सम्पूर्ण संवाद पर.ग़ौर करें, तो उन्होंने नेताजी के शब्द पकड़कर उनकी बात पर अपनी बात व…"
Dec 31, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"शीर्षक पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है।"
Dec 31, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"सादर नमस्कार। महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहुत बढ़िया रचना हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय तेजवीर सिंह जी। एक सुझाव विषयांतर्गत केंद्रित करने.हेतु। अंतिम वाक्य में /...तुम्हारी वज़ह से मेरी ज़िंदगी.../ के स्थान पर /तुम्हारे पिता से मित्रता के विश्वास और तुम्हारी उस…"
Dec 31, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"सादर नमस्कार। चिरपरिचित मुद्दे और प्रसंग पर एक और विचारोत्तेजक रचना। हार्दिक बधाई आदरणीया नयना (आरती) कानिटकर जी।"
Dec 31, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"आदाब। विश्वास को परिभाषित करती उम्दा और समसामयिक बढ़िया सृजन हेतु हार्दिक बधाई आदरणीया प्रतिभा जोशी पाण्डेय जी। कम शब्दों में गहरी बात।"
Dec 31, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"आभास (लघुकथा) : क्रिसमस पूर्व की संध्या। पार्क में सान्ता क्लॉस दूर से ही सान्ता वाली वेशभूषा में सजे-धजे कुछ बाल-सान्ता क्लॉज़ों को टॉफ़ियाँ लोगों को बाँटते देख आनंदित हो रहे थे। एक नेता जी उनसे रूबरू हुए, तो बोले, "सान्ता जी, इनमें से एक भी…"
Dec 31, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"आदाब। यह भी एक उम्दा बढ़िया रचना। हार्दिक बधाई आदरणीया रचना भाटिया 'निर्मल' जी। शीर्षक बेहतर हो सकता था। मुझे सूझ रहे हैं : /मन का ताज/, /ढहता ताज/, /निर्वाह/.... जैसा कोई शीर्षक।"
Dec 30, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"आदाब। बढ़िया उम्दा सकारात्मक रचना । हार्दिक बधाई आदरणीया दिव्या राकेश शर्मा जी। इंडवा के बारे में जानकारी मिली। मुझे लगता है कि इसे आप कुछ कम शब्दों में भी कह सकेंगी। जैसा कि आदरणीय सर जी ने परिमार्जित रूप में प्रस्तुत किया है हमें मार्गदर्शन प्रदान…"
Dec 30, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"आदाब। आपकी पिछली प्रविष्टियों से भिन्न अधिक शब्दों की अच्छी रचना। हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह जी। मैं आदरणीय सर श्री योगराज जी की टिप्पणी से सहमत हूँ। सांकेतिकता और कम शब्दों में यह रचना आप बेहतर कह सकेंगे।"
Dec 30, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"आदाब। विषयांतर्गत बढ़िया सकारात्मक संदेशवाहक रचना हेतु हार्दिक बधाई जनाब तस्दीक़ अहमद ख़ान साहिब। पहली पंक्ति वाले लघु संवाद में इंवर्टिड कौमाज़ नहीं लग सके हैं।"
Dec 30, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"शुक्रिया। दरअसल मेरी टिप्पणी में 'बढ़िया शैली' से मेरा आशय 'व्यंग्य ध्वनि/शैली' ही था। मेरे विचार से कुछ पाठकों को सम्प्रेषण में परेशानी हो सकती है। कहीं कुछ तो अस्पष्टता या अस्वाभाविकता लगती है मुझे।"
Dec 30, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"आदाब। विषयांतर्गत एक प्रचलित धारणा को बढ़िया शैली में उभारती बढ़िया रचना हेतु हार्दिक बधाई आदरणीया अनिता रश्मि जी। नफ़रत और डर /भय शब्द कुछ भारी से लग रहे हैं डॉक्टर प्रायः इस शैली में बात नहीं करते हैं। मरीज़ धन ख़र्च से भय खाता है चिकित्सक से नहीं।…"
Dec 30, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"सादर नमस्कार। गोष्ठी में प्रशिक्षण देता बहुत बढ़िया लघुकथा परिमार्जन। हार्दिक धन्यवाद आदरणीय सर श्री योगराज जी।"
Dec 30, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-81
"आदाब। हार्दिक स्वागत। हमारे जीवन से जुड़े सहज बाल-प्रसंग की याद ताज़ा कराती विषयांतर्गत बहुत बढ़िया रचना हेतु हार्दिक बधाई आदरणीया रक्षिता सिंह जी। शीर्षक नहीं दिया गया है। कुछ एक टंकण त्रुटियाँ रह गयी हैं। इसे लघुकथा का बेहतर रूप देने हेतु इस पर अभी…"
Dec 30, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-138
"आदाब।.उपरोक्त दो प्रस्तुतियों से हटकर गंभीर भावों व संदेशों से युक्त पेशकश हेतु मुबारकबाद जनाब अमित कुमार 'अमित' साहिब।"
Dec 29, 2021
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-138
"आदाब। अच्छी प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय आज़ी तमाम जी। चार अक्षरों के शब्दों में बढ़िया काफ़िये।"
Dec 29, 2021

Profile Information

Gender
Male
City State
Shivpuri M.P.
Native Place
Shivpuri
Profession
Radio Announcer
About me
A Private School- teacher, Freelancer and a Casual Radio Announcer. Simlple living, high thinking, fond of reading and writing.

Sheikh Shahzad Usmani's Blog

मुंगेरीलाल के वैक्सीन सपने (कहानी) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी :

मुंगेरीलाल और कोरोनाकाल... सबके बहुत बुरे हालचाल! लॉकडाउन पर लॉकडाउन... घर में क़ैद सब जॉब डाउन, रोज़गार डाउन! बेचारे मुंगेरीलाल ने अपनी कम्पनी की नौकरी छोड़कर बड़ी मुसीबत कर ली थी सात साल पहले। उनका काम और रुझान दिलचस्प और संतोषजनक था, फ़िर भी सपनों और दिवास्वप्नों में खोये रहने और बड़ी-बड़ी बातें फैंकने के कारण दफ़्तर, घर, बाज़ार और ससुराल सभी जगह लोग उनका मज़ाक उड़ा-उड़ा कर मौज-मस्ती कर लिया करते थे। उन सबकी बातों को मुंगेरीलाल कभी हल्के में, तो कभी बहुत गंभीरता से ले लेते थे।

एक बार…

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Posted on November 12, 2020 at 8:30am — 2 Comments

गार्गी की बार्बी (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

भगवान देता है, तो छप्पर फाड़ कर देता है। लेता है, तो एक झटके में ले लेता है। देकर ले लेता है, तो हँसाने के बाद रुला-रुला कर। राजन, रंजीता और गंगा का ज़िन्दगीनामा भी यही साबित करता रहा; गार्गी और गार्गी की बार्बी का भी! बार्बी के साथ कब, क्या, कैसे और क्यूँ होगा; बार्बी ने कभी सोचा न था। सोचती भी कैसे? उसकी सोच तो उसकी मम्मी पर निर्भर थी। उसकी मम्मी ने भी तो न सोचा था वह सब। यही हाल गार्गी का था। गार्गी के साथ कब, क्या, कैसे और क्यूँ होगा; गार्गी ने कभी सोचा न था। सोचती भी कैसे? उसकी सोच तो…

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Posted on November 10, 2020 at 8:30am — 4 Comments

दिल के हाल सुने दिलवाला (लघुकथा)

"अपनी पैरों से रौंदें, दूजी जो भा जाये!"



"घर की मुर्ग़ी दाल बराबर; नयी पीढ़ी को कौन समझाये!"



अपनापन त्याग कर ख़ुदग़र्ज़ी, मनमर्ज़ी, दोगलापन, पागलपन, बचकानापन दिखाती अपने मुल्क की नई पीढ़ी की सोच और पलायन-गतिविधियों पर दो बुजुर्गों ने अपनी-अपनी राय यूं ज़ाहिर की।



"... 'ओल्ड इज़ गोल्ड' कहावत को छोड़ो जी; ओल्ड इज़ सोल्ड! नई पीढ़ी है सो बोल्ड! उन्हें ज़मीनी स्टोरीज़ टोल्ड हों या अनटोल्ड! हम बुड्ढे तो हुए क्लीन-बोल्ड!" उनमें से एक ने दूसरे से कहा, लेकिन ख़ुद के…

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Posted on March 10, 2020 at 2:34pm — 4 Comments

हिताय और सुखाय (संस्मरण)

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Posted on November 23, 2019 at 1:00pm — 7 Comments

Comment Wall (13 comments)

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At 12:50am on October 5, 2018, mirza javed baig said…

आली जनाब शहज़ाद उस्मानी साहिब आदाब, 

मुझे अपनी दोस्तों की फ़ेहरिस्त में जोड़ने का शुक्रिया 

At 6:43am on July 2, 2018, राज़ नवादवी said…

"आदरणीय Sheikh Usmani साहब, तरही मुशायरे में मेरी ग़ज़ल में शिरकत का दिल से शुक्रिया. समयाभाव था, कमेंट बॉक्स बंद हो चुका है. इसलिए यहाँ से आभार प्रकट कर रहूँ हूँ.सादर "

At 11:59am on April 12, 2018, MD SHAFIQUE ASHRAF said…

जी बहूत  बहुत शुक्रिया जनाब ... नया हूँ .... थोड़ा सीखने का मौका दीजिये  

At 10:23am on January 8, 2017, Dr Ashutosh Mishra said…
आदरणीय शेख भाई जी आपके मित्रों की सूची में खुद को शामिल पाकर मैं सुखद अनुभूति कर रहा हूँ आपकी लघु कथाएं इस मंच पर मेरे बिशेष आकर्षण का केंद्र है आपकी हर लघु कथा मैं पढता हूँ आपकी कलम सृजन के नए आयाम स्थापित करती रहे ऐसी अपनी शुभकामनाओं के साथ सादर
At 8:23pm on August 5, 2016, pratibha pande said…

आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ  आदरणीय उस्मानी जी  ,आपका रचनाकर्म हर दिन नई बुलंदियां छुएँ ,ये कामना करती हूँ 

At 7:30am on June 20, 2016, सुरेश कुमार 'कल्याण' said…
श्रद्धेय शेख शहजाद उस्मानी साहब ये सब तो आप जैसे मित्रों के सहयोग से ही हुआ है और आशा करता हूं कि भविष्य में भी मेरा मार्गदर्शन करते रहेंगे। हृदय की गहराईयों से धन्यवाद ।
At 8:42am on May 24, 2016, महिमा वर्मा said…

आभार आपका आ.शेख उस्मानी सर जी,अभी जानकारी  पूरी नहीं है ,तो आपको जवाब देने में देर हो गई.पुनः आभार आपका .

At 2:11pm on May 1, 2016, pratibha pande said…

मित्रता के लिए आभार 

At 8:41am on November 18, 2015, pratibha pande said…

हार्दिक आभार आपका आदरणीय 

At 9:27am on November 4, 2015, kanta roy said…

देखी वफ़ा-ए-फ़ुरसत-ए-रंज-ओ-निशात-ए-दहर

ख़मियाज़ा यक दराज़ी-ए-उमर-ए-ख़ुमार था---- 

मिर्ज़ा ग़ालिब साहब का ये शेर आज आपके लिए
असीम शुभकामनाएँ आपको आदरणीय शहजाद जी।

 

 
 
 

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"आदरणीय श्री लक्ष्मण धामी मुसाफिर सर प्रणाम। सर गीत तक पहुंचने और उस पर सकारात्मक टिप्पणी देने के…"
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"आदरणीय अमीरुद्दीन अमीर जी, शुभस्य शीघ्रम्.  पहल करें. किसी अतिथि से सार्थक रचना प्राप्त कर…"
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