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Omprakash Kshatriya
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Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"इस बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई"
May 31
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"आदरणीय शेख शहजाद उस्मानी जी इस बेहतरीन लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई"
May 31
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी आपको लघुकथा अच्छी लगी। मेरी मेहनत सफल हो गई।हार्दिक आभार आपका।।"
May 31
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"आदरणीय शेख़ शहजाद उस्मानी जी आप  को लघुकथा अच्छी लगी। मेरी मेहनत सफल हो गई।हार्दिक आभार आपका।।"
May 31
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"आदरणीय विनय कुमार सिंह जी आपको लघुकथा अच्छी लगी। मेरी मेहनत सफल हो गई।हार्दिक आभार आपका।।"
May 31
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"आदरणीय मनन कुमार सिंह जी आपको लघुकथा अच्छी लगी। मेरी मेहनत सफल हो गई।हार्दिक आभार आपका।।"
May 31
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"आदरणीय रक्षिता सिंह जी आपको लघुकथा अच्छी लगी। मेरी मेहनत सफल हो गई।हार्दिक आभार आपका।।"
May 31
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"दोहरी मानसिकता को उजागर करती बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई"
May 31
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"घोटाले को व्यक्त करती बढ़िया रचना। इसे पैरों में विभक्त कर लीजिएगा ताकि इसकी प्रभावोत्पादक्ता बढ़ जाए।"
May 31
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"प्रतीक रूप से कही गई इस लघुकथा के लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें"
May 31
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"बहुत खूब कही गूगल दादी।"
May 31
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-74 (विषय: अनुभव)
"लघुकथा- अपनी करनी " सुन बेटा! आम मत लाना। मगर, मेरे घुटने दर्द कर रहे हैं, उसकी दवा तो लेते आना,"  बुजुर्ग ने घुटने पकड़ते हुए कहा। " हुँ! " बेटे ने बेरुखी से कहा, " दिन भर बिस्तर पर पड़े रहते हो। घुटने दर्द नहीं करेंगे…"
May 31
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"हमारी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि"
May 2
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"आदरणीय मननकुमार जी आपके इस शानदार सुझाव के लिए हार्दिक बधाई"
Apr 30
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-73
"लघुकथा- आदर्श " तुम बहुत गुस्से के साथ अंदर गए थे। अब क्या हुआ?" " उसने समझा-बुझाकर गुस्सा शांत कर दिया।" " अच्छा !" " हां । उसने कहा कि काम अपनी गति से होता है और बस समझो हो गया।" " मगर तुम तो कह…"
Apr 30
Omprakash Kshatriya replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-119
"बहुत अच्छी रचना"
Sep 13, 2020

Profile Information

Gender
Male
City State
Neemuch Madhya Pradesh India
Native Place
Ratangarh
Profession
Govt Service
About me
मूलत: बालकहानीकार , लेखक और शिक्षक

लघुकथा— गलतफहमी

लघुकथा—                                             

गलतफहमी

                                                                   ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

भाभी ने फिर वही उलाहना दिया,'' आप से पराये अच्छे हैं. जिन्हों ने बुरे वक्त में हमारी सहायता की थी.''

'' हां भाभी. मैं भी यही चाहता था.''

'' हांहां, मुझे पता है. आप क्या चाहते थे. हम भीख मांगे. अपनी जमीन आप के नाम कर दें.''

'' वह तो आप ने अब भी उस ट्रस्ट के नाम पर की है.''

'' हां की है. उस ट्रस्ट ने हमारी सहायता तब की थी जब इस के पापा एक दुर्घटना में शांत हो गए थे. मगर, उस ट्रस्टी से मैं आज तक नहीं मिलीं.'' भाभी ने यह कह कर मुंह बनाया, '' आप से इन का वह पराया दोस्त अच्छा है जिस ने हमें ट्रस्ट से सहायता दिलवाई थी. उसी की बदौलत आज मेरा बेटा एक सफल व्यापारी है.''

'' मैं भी यही चाहता था भाभी. यह आत्मनिर्भर बनें. किसी की सहायता के बिना.''

'' रहने दीजिए. आप की निगाहें तो हमारी जमीन पर थी. उसे हड़पना चाहते थे,'' भाभी ने यही कहा था कि किसी ने दरवाजे की घंटी बजाई.

उन्हों ने दरवाजा खोला तो चौंक गई,'' अरे भाई साहब ! आप. आइएआइए. इन से मिलिए. ये कहने मात्र के लिए मेरे देवर है.''

फिर भाभी अपने देवर की ओर घुम कर बोली,'' और देवरजी ! ये इन के वही दोस्त है जिन्हों ने हमारी बुरे दिनों में सहायता की थी.''

तभी आंगुतक ने हाथ जोड़ते हुए कहा'' अरे ! सरजी आप !'' फिर माला टंगी तस्वीर की ओर इशारा कर के कहा, '' ये आप के भाई थे ?''

'' जी हां.''

तभी भाभी बोली,'' आप इन्हें जानते हैं ?''

'' हां. ये वही ट्रस्टी है, जिन्हों ने गोपनीय रूप से ट्रस्ट बना कर आप की जमीन पर, आप का कारखाना खोलने में मदद की थी.''

यह सुनते ही भाभी संहल नहीं पाई. धड़ाम से सौफे पर बैठ गई.

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लघुकथा - केस

कार से टकरा कर लहूलुहान हुए बासाहब से इंस्पेक्टर ने दोबारा पूछा , “ क्या सोचा है ? कार सुधराई के पैसा देना है या नहीं ?”

“साहब ! बहुत दर्द हो रहा है. अस्पताल ले चलिए.” वह घुटने संहाल कर बोला तो इंस्पेक्टर ने डपट दिया,“अबे साले ! मैं जो पूछ रहा हूँ, उस का जवाब दे ?” कहते हुए जमीन पर लट्ठ दे मारा.

“साहब ! मेरा जुर्म क्या है ? मैं तो रोड़ किनारे बैठा था. गाड़ी तो लड़की चला रही थी. उसी ने मुझे टक्कर मारी है. साहब मुझे छोड़ दीजिए. ” वह हाथ जोड़ते हुए धीरे से विनय करने लगा.

“जानता…

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Posted on May 3, 2016 at 12:30pm — 14 Comments

लघुकथा- नफरत

लघुकथा- नफरत

अख़बार में प्लास्टिक की बोरी पर दीपक बेचते गरीब बच्चे की फोटो के साथ उस की दास्ताँ छपी थी. जिस ने अपने मेहनत से अमेरिका में एरोनाटिक्स इंजीनियरिंग में मुकाम हासिल किया था. उस फोटो को देख कर हार्लिक बोला , “ कितना गन्दा बच्चा है. इसे देख कर खाना खाने की इच्छा ही न हो.”

“ यदि मैं देख लू तो मुझे उलटी हो जाए,” लुनिक्स ने अपना तर्क दिया, “ मम्मा ! ये भारतीय बच्चे इतने गंदे क्यों होते हैं ? आप तो भारत में रही है ना. आप वहां कैसे रहती थी. ये तो नफरत के काबिल है.”

“…

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Posted on November 7, 2015 at 3:30pm — 10 Comments

लघुकथा - अनाथ

लघुकथा- अनाथ

पत्नी की रोजरोज की चिकचिक से परेशान हो कर महेश पिताजी को अनाथालय में छोड़ दरवाजे से बाहर तो आ गया, मगर मन नहीं माना. कहीं पिताजी का मन यहाँ लगेगा कि नहीं. यह जानने के लिए वह वापस अनाथालय में गया तो देखा कि पिताजी प्रबंधक से घुलमिल कर बातें कर रहे थे. जैसे वे बरसों से एकदूसरे को जानते हैं.

पिताजी के कमरे में जाते ही महेश ने पूछा, “ आप इन्हें जानते हैं ?” तो प्रबंधक ने कहा, “ जी मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ. वे पिछले ३५ साल से अनाथालय को दान दे रहे हैं . दूसरा बात…

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Posted on October 21, 2015 at 3:00pm — 19 Comments

लघुकथा - पूंछ

लघुकथा – पूंछ

सीढ़ियाँ गंदी हो रही थी कविता ने सोचा झाड़ू निकल दूँ. यह देखा कर पड़ोसन ने कचरा सीढ़ियों पर सरका दिया.

बस ! फिर क्या था. कविता का पारा सातवे आसमान  पर, “ मैं इस के बाप की नौकर हूँ. नहीं निकाल रही झाड़ू,” बड़बड़ाते हुए कविता ऊपर आई , “ साली अपने को समझती क्या है ? कभी सीढ़ियों पर पानी डाल देगी. कभी लहसन का कचरा. कभी कुछ. मैं इस की नौकर हूँ जो रोजरोज सीढ़ियाँ साफ करती रहू. साली अपने को न जाने क्या समझती है ?

“ क्यों जी. आप बोलते क्यों नहीं.” उस ने पति के हाथ से अख़बार…

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Posted on September 22, 2015 at 8:30am — 4 Comments

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At 7:25am on January 26, 2016, सतविन्द्र कुमार राणा said…
जन्मदिवस एवम् गणतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं जी।
At 1:50am on January 26, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें...

At 8:09pm on October 31, 2015, Omprakash Kshatriya said…

आदरणीय राहिला जी आप का कहना सही है. मगर पोलिसी कर के लोगों को मरवा देना, इस पर मेरा प्रश्न था. कही ऐसा भी होता है, इसी के लिए कहा था. खैर आप का शुक्रिया.

At 3:18pm on October 30, 2015, Rahila said…
हां आद. ओम प्रकाश जी ये घटना हो चुकी है । बहुत से लोग पॉलिसी के बारे में ज्यादा समझते नही ंबस ले लेते है ।
 
 
 

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