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Dayaram Methani
  • Male
  • Bhilwara - rajsthan
  • India
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Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-145
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार।"
Jul 29
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-145
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, समीक्षात्मक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार। सुधार का प्रयास करता रहूंगा। सादर।"
Jul 29
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-145
"आदरणीय रिचा यादव जी, पोस्ट पर टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।"
Jul 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-145
"आदरणीय संजय शुक्ला जी, सुंदर गज़ल के लिए हार्दिक बधाई।"
Jul 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-145
"आदरणीय रिचा यादव जी, सुंदर गज़ल के लिए हार्दिक बधाई।"
Jul 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-145
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' जी, सुंदर गज़ल के लिए हार्दिक बधाई।"
Jul 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-145
"आदरणीय सालिक गणवीर जी, सुंदर गज़ल के लिए हार्दिक बधाई। लक्ष्मण धामी का सुझाव सही है। उसकी के बजाय तेरी करना ठीक रहेगा।"
Jul 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-145
"आदरणीय संजय शुक्ला जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक अभार।"
Jul 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-145
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, तरही मिसरे पर सुंदर गज़ल के लिए हार्दिक बधाई।"
Jul 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-145
"2122 1122 1122 112 जख्म दे कह दिया जाओ तुम्हें आज़ाद कियाबांट कर देश को उसने हमें बरबाद किया मत गिराओ ये पुराने किले सद्भाव भरेसाथ जीना यहाँ तो क्यों हमें नाशाद किया कोशिशें तो हमें मिलकर अभी करनी होगीबिन मुहब्बत के किसी ने किसे आबाद किया खाइयाँ…"
Jul 28
Dayaram Methani replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव’ अंक 135 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय सौरभ पाण्डे जी, टिप्पणी कर प्रोत्साहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद। छता का अर्थ छाता ही मान कर लिखा है। सादर।"
Jul 24
Dayaram Methani replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव’ अंक 135 in the group चित्र से काव्य तक
"शक्ति छंद-----------पड़ी आज बारिश उड़ाये छता।सखे पांच कैसे बचाये छता।नही बिजलियों बादलों से डरे।हँसें सब सखे शोखियों से भरे। सभी हाथ थामे चले प्यार से।बचाते सभी को जलद धार से।नहीं साथ छोड़ा किसी ने ज़रा।सबक एकता का दिया है खरा। - दयाराम मेठानी.(मौलिक…"
Jul 23
Dayaram Methani and Pratibha Pandey are now friends
Jul 18
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-141
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Jul 17
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-141
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार।"
Jul 17
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-141
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रदत्त विषय पर सुंदर सृजन के लिए बधाई।"
Jul 17

Profile Information

Gender
Male
City State
BHILWARA
Native Place
BHILWARA
Profession
journlist and writer
About me
I like to read and write kavita, gazal, short stories and artical.

Dayaram Methani's Blog

गज़ल

गज़ल

2122 2122 2122 212

आजकल हर बात पर लड़ने लगा है आदमी,

क्रोध के साये तले पलने लगा है आदमी।

चाह झूठी शान की अब बढ़ गई है बहुत ही,

इस लिये बेचैन सा रहने लगा है आदमी।

आग हिंसा की बहुत झुलसा रही है देश को,

खूब धोखा दल बदल करने लगा है आदमी।

धन कमाया पर बचाया कुछ नहीं अपने लिये,

अब बुढ़ापे में छटपटाने लगा है आदमी।

जिन्दगी भर झगड़ने से क्या मिला इंसान को,

देख ’’मेठानी‘‘ बहुत रोने लगा है आदमी।

मौलिक…

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Posted on January 30, 2022 at 12:16pm — 2 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 2



ज़िन्दगी में हर कदम तेरा सहारा हूँ

नाव हो मझधार तो तेरा किनारा हूँ

तुम भटक जाओ अगर अनजान राहों में

पथ दिखाने को तुम्हें रौशन सितारा हूँ

ज़िन्दगी का खेल खेलो तुम निडरता से

हर सफलता के लिए मैं ही इशारा हूँ

राह जीने की सही तुमको दिखाऊंगा

ज़िन्दगी के सब अनुभवों का पिटारा हूँ

साथ क्यों दूं मैं तुम्हारा सोच मत ऐसा

अंश तुम मेरे पिता मैं ही तुम्हारा हूँ

- दयाराम मेठानी…

Continue

Posted on November 6, 2021 at 10:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल

 2122 2122 2122 212

नाव है मझधार में नाविक नशे में चूर है

सांझ है होने लगी मंजिल नज़र से दूर है

संकटों से आदमी क्या देव भी बचते नहीं

वक्त के आगे सभी होते यहां मजबूर है

जिन्दगी की कशमकश में जीना’ जिसको आ गया

यों समझ लो हौसलों से वो बहुत भरपूर है

दोष है अपना समय के साथ चल पाये नहीं

बंद मुट्ठी से फिसलना वक्त का दस्तूर है

हाल ‘‘मेठानी’’ बतायंे क्या किसी को अब यहां

आदमी सुनता नहीं अब हो गया मगरूर…

Continue

Posted on August 27, 2019 at 10:00pm — 2 Comments

गज़ल सीख लो

2122 2122 212

दर्द को दिल में दबाना सीख लो

ज़िन्दगी में मुस्कराना सीख लो

आंख से आंसू बहाना छोड़िये

हर मुसीबत को भगाना सीख लो

ज़िन्दगी है खेल, खेलो शान से

खेल में खुद को जिताना सीख लो

फूल को दुनिया मसल कर फैंकती

खुद को कांटों सा दिखाना सीख लो

छोड़ दें अब गिड़गिड़ाना आप भी

कुछ तो कद अपना बढ़ाना सीख लो

थी जवानी जोश भी था स्वप्न भी

दिन पुराने अब भुलाना सीख लो

कौन…

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Posted on July 4, 2019 at 9:30pm — 8 Comments

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At 10:09pm on May 24, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय दयाराम मेथानि जी आदाब बहुत बहुत शुक्रिया जनाब
 
 
 

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