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Chetan Prakash
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Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदाब 'रिया' जी, आपकी ग़ज़ल का संशोधित स्वरूप  का अवलोकन कर रहा हूँ । अच्छी ग़ज़ल को  बार-बार पढ़ने का  अलग  आनंद  होता  है । परन्तु गिरह अभी भी मुझे  क़म से क़म  निरापद  नहीं  लगती  !…"
15 hours ago
Chetan Prakash posted a blog post

वो बेकार है

  1212     1122     1212      22 / 112 तमाम उम्र सहेजी मगर वो बेकार है  अजीब बात है शाइर डगर वो बेकार हैसुहाने चाँद की रातों सफर वो बेकार हैलो अब कहूँ तो कहूँ क्या असर वो बेकार हैबिना किताब बिना बिम्ब काव्य की सर्जना जो खोलता है मआनी नगर वो बेकार हैनयी - नयी है ये दुल्हन बहार सावनी अबनया चलन है सो सहवास घर वो बेकार है हमारे गुरू जी अभी सुन बहुत बड़ी जीत हैंहवा  चहक  तो  रही शह्र पर वो बेकार है !ये उस्तरा है जो बन्दर के हाथ असबाब याँसँभाल कर रखो 'चेतन' कहर वो बेकार है !मौलिक एवम्…See More
16 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदाब, मोहतरमा रचना भाटिया जी, ग़ज़ल कहने आपके अंदाज में, विश्वास करिए,  सुखद सुधार हुआ है ! और, प्रस्तुत ग़ज़ल भी मुझे  प्रशंसनीय लगी, सो बधाई स्वीकार करें ! आदरणीय  समर कबीर साहब ने  बहुत महत्वपूर्ण  सुझाव दिए हैं, उन पर…"
19 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
" नमस्कार,  सलिक गणवीर साहब,  ग़ज़ल तो ठीक-ठाक है, शाब्दिक  दोहराव  ज्यादा हैं ! और तीसरे शे'र का  सानी बह्र में नहीं है, कृपया देखें ! सादर "
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"शुभ प्रभात, अच्छी ग़ज़ल हुई है, जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ! छठे शे'र का सानी, बेहतर  हो सकता था, बंधु, यदि "कर गए अपराध कोई यार क्या अनजाना हम" 'क्या' के  स्थान पर 'थे हो जाए  ! वैसे ग़ज़ल…"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"आदाब, आदरणीया,  बहुत  खूबसूरत  ग़ज़ल  है, बधाई  स्वीकार करें ! एक  से बढ़कर एक  शेर हुआ है ! सादर "
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-133
"तरही ग़ज़ल  : 2122     2122     2122   212 भूल जाते दोस्ती में बोलते हकलाना हम  और बचपन नाव कागज की बहाते जाना हम खेलते थे खेल सारे अमराई सुन प्यार के सुगबुगाते कान उसके प्यार में हकलाना …"
yesterday
Chetan Prakash posted a blog post

वो बेकार है

  1212     1122     1212      22 / 112 तमाम उम्र सहेजी मगर वो बेकार है  अजीब बात है शाइर डगर वो बेकार हैसुहाने चाँद की रातों सफर वो बेकार हैलो अब कहूँ तो कहूँ क्या असर वो बेकार हैबिना किताब बिना बिम्ब काव्य की सर्जना जो खोलता है मआनी नगर वो बेकार हैनयी - नयी है ये दुल्हन बहार सावनी अबनया चलन है सो सहवास घर वो बेकार है हमारे गुरू जी अभी सुन बहुत बड़ी जीत हैंहवा  चहक  तो  रही शह्र पर वो बेकार है !ये उस्तरा है जो बन्दर के हाथ असबाब याँसँभाल कर रखो 'चेतन' कहर वो बेकार है !मौलिक एवम्…See More
Tuesday
Chetan Prakash commented on Saurabh Pandey's blog post ग़ज़ल : कामकाजी बेटियों का खिलखिलाना भा गया // -- सौरभ
"नमस्कार, आदरणीय  सौरभ  साहब,  ग़ज़ल प्रथम श्रेणी  का काव्य  है, आपकी प्रस्तुति  से सम्बंधित बिम्ब प्रयोग की उपादेयता  पर चर्चा / समीक्षा  अनावश्यक  बात  है ,  कुछ  समझ में नहीं  आया,…"
Monday
Chetan Prakash commented on Sushil Sarna's blog post प्रश्न .....
" नमन,  सुशील  सरना  साहब,  अंतस की विवरणिका  है, आदरणीय आप की  कविता ! अच्छी लगी, सनातन प्रश्न का जवाब  खोजती  यह प्रस्तुति  !"
Monday
Chetan Prakash commented on Saurabh Pandey's blog post ग़ज़ल : कामकाजी बेटियों का खिलखिलाना भा गया // -- सौरभ
"आदरणीय सौरभ साहब, नमन! प्रश्न सूर्य जैसे जीवन की धुरी के रुपक पर, मान्यवर आप, अपनी ग़ज़ल के माध्यम से लगा रहे हैं, और, पाठकीयता पर निरीह पाठक की योग्यता / क्षमता पर लगा रहे, बंधु-श्रेष्ठ यह अन्याय है! सादर...! "
Monday
Chetan Prakash commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास
"आदाब, मनोज अहसास, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है! कुछ जगहों पर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा, यथा  (१) पांचवें शे'र का सानी मिसरा, " मेरे लबों पर बस तेरे हक़ में दुआ रहे " इसमें पर के स्थान पर 'पे' बेहतर होता! (२ ) छठे…"
Monday
Chetan Prakash commented on Saurabh Pandey's blog post ग़ज़ल : कामकाजी बेटियों का खिलखिलाना भा गया // -- सौरभ
"नमन, सौरभ साहब, संयोग से मैंने पहली बार ही आपकी कोई ग़ज़ल देखी, अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें! हाँ, व्याकरण चिन्हों को लगाते आपको कुछ सावधानी ज़रूर बरतनी होगी! यथा, "सूर्य के आह्वान पर मौसम भला क्या आ गया ? " " सूर्य, ज़ाहिर…"
Monday
Chetan Prakash commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (परछाईयाँ)
"अच्छी ग़ज़ल हुई, आदाब, 'अमीर' साहब! मकते का सानी मिसरा लय भंग करता दिख रहा है! गुज़ारिश है, इधर ध्यान फरमा हों! "
Monday
Chetan Prakash and आशीष यादव are now friends
Sunday
Chetan Prakash commented on Samar kabeer's blog post एक ताज़ा ग़ज़ल
"आदाब, आदरणीय समर कबीर साहब, नाचीज की बात का आपने संज्ञान लिया और, बह्र सही कर मुझे उपकृत  किया, आपका  बहुत-बहुत आभारी  हूँ ! सादर  ,,!"
Sunday

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Male
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Baraut
Native Place
Hapur
Profession
Teaching
About me
I'm a poet rather born than made or trained since my childhood

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वो बेकार है

  1212     1122     1212      22 / 112

 तमाम उम्र सहेजी मगर वो बेकार है 

 अजीब बात है शाइर डगर वो बेकार है

सुहाने चाँद की रातों सफर वो बेकार है

लो अब कहूँ तो कहूँ क्या असर वो बेकार है

बिना किताब बिना बिम्ब काव्य की सर्जना 

जो खोलता है मआनी नगर वो बेकार है

नयी - नयी है ये दुल्हन बहार सावनी अब

नया चलन है सो सहवास घर वो बेकार है 

हमारे गुरू जी अभी सुन बहुत बड़ी जीत हैं

हवा  चहक  तो  रही…

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Posted on July 27, 2021 at 8:30am

ग़ज़ल

221     2121     1221     212

रस्मो- रिवाज बन गयी पहचान हो गयी 

वो दिलरुबा थी मेरी जो भगवान हो गयी

मक़तल बना है शहर वो रफ्तार ज़िन्दगी,

मुश्किल हुई है जीस्त कि श्मशान हो गयी

हर शख्स वो अकेला ही दुनिया में आजकल,

क्या वो करें जो कह सकें गुलदान हो गयी

सुन राजदाँ बहुत हुई बेज़ार ज़िन्दगी,

कासिद नहीं आया जबाँ कान हो गयी 

जाहिल बने रईस वो हक़दार देश  के,

अब हार-जीत उनकी खुदा शान हो…

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Posted on July 22, 2021 at 7:30am

ग़ज़ल

11212     11212     11212    11212

तुम्हें कह चुका हूँ, मैं दोस्तो मेरे साथ आज बहार है !

है महर खुदा की वो आसरा सो खिवैया ही तो कहार है !

थी नहीं कभी रज़ा जिसकी होड़ - उड़ान में कभी ज़िन्दगी,

कहूँ कैसै वो रहा साथी मेरा जहाँ, सदा बारहा वो तो हार है !

न तुम्हें कोई भी है फिक्र गाँव- गली का वो न लिहाज़ है, 

न वो शर्म माँ कि न बाप की,  न तुम्हें जड़ों से ही प्यार है !

न वो मानता है किसी भी सोच को जानता नहीं मर्म…

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Posted on July 12, 2021 at 10:05am

ग़ज़ल

2122    2122    2122   212

बह्रे रमल मुसम्मन महफूज़:

हिब्ज जिसको राजधानी क्या ज़रूरत धाम की !!

सारी दुनिया है उसी की कब रज़ा  हुक्काम  की !!

ज़िन्दगी तो  दोस्त बस जिन्दादिली का नाम है,

मौज़िजा हो जायेगा यारा इबादत  राम की  !!

साथ जीते भारती हम मत करें नाहक मना,

अन्त भी होगा यहीं या रब मलानत जाम की !!

आइना टूटा हुआ है, यार देखोगे क्या  तुम ?

इल्म की छाया नही है हर खिताबत नाम की !!

कब…

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Posted on July 6, 2021 at 8:53pm

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At 6:35am on July 22, 2021, रणवीर सिंह 'अनुपम' said…
आदरणीय, चेतन जी, "दोहे : कैसे- कैसे  लोग" शीर्षक के तहत लिखे गए दोहे बहुत सुंदर हैं और बहुत अच्छे लगे।

निम्न चरण विधान में न होने से इनमें लय भंग है। जिसे दूर करने की जरूरत है।

जन्म-भूमि स्वर्ग सम हो
(कारण-नवीं मात्रा पर शब्द पूरा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए)

कृतघ्न पक्के लोग
(कारण-आरंभ में जगण "कृतघ्न"आ रहा है, जो नहीं होना चाहिए)

कर रहे बस भोग
(कारण-एक मात्राभार कम है, साथ ही पाँचवीं मात्रा पर शब्द पूरा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए)

न हों कभी बदनाम
(कारण-पहली मात्रा पर शब्द पूरा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए)

विद्या  हमें  सिखाती है,
(कारण-13 मात्राओं की जगह 14 मात्राएँ हैं, जो नहीं होनी चाहिए)

कर अन्याय प्रतिकार
(कारण-11 की जगह 12 मात्राएँ हैं जो नहीं होनी चाहिए)
At 11:46pm on November 22, 2020, DR ARUN KUMAR SHASTRI said…

भाई चेतन जी
नमन -
इस्लाह का
सलीका आ जायेगा
मैंने आज तलक
मुकम्मल तो कोई देखा नहीं
गलतियां निकालोगे-
तो सीखूंगा ही ।।
मैं तो अधूरा था
अधूरा रहा
और हूँ अब तलक
आज आया हूँ आपकी बज्म में
कुछ सिखा दोगे -
तो सीखूंगा भी ।।

At 11:59am on June 27, 2020, Samar kabeer said…

जनाब चेतन प्रकाश जी,ये टिप्पणी आप मुशाइर: में दें,तो मुझे जवाब देने में आसानी होगी ।

 
 
 

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