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Rupam kumar -'मीत'
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Welcome, रुपम कुमार -'मीत'!

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Samar kabeer commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, क़तील शिफ़ाई की ज़मीन में ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें । 'दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करेकिया है जो मेरे दुश्मन ने वो सगा न करे' मतले के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,ऊला बदलने का…"
32 minutes ago
amita tiwari commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
" बहुत  अच्छी,सरल और सच्ची भाव रचना "
34 minutes ago
amita tiwari commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"  "
35 minutes ago
Rupam kumar -'मीत' posted a blog post

दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')

बह्र:- 1212 1122 1212 112दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करेकिया है जो मेरे दुश्मन ने वो सगा न करे [1]उसे है इल्म बिछड़ने से लोग टूटते हैंतभी वो मोतियों को डोर से जुदा न करे [2]बुज़ुर्ग हो गया हूँ ज़िंदगी से इसलिए भीवो देख भाल करे पर मेरी दवा न करे [3]नहीं है ख़ौफ़ समंदर में डूबने का मुझेमगर यूँ क़र्ज़ में मरना पड़े ख़ुदा न करे [4]मुहाल है ज़मीं से आसमान तक का सफ़रबुलंदियों पे यूँ जा कर कोई गिरा न करे [5]मैं झूटी ज़िंदगी से अब नजात चाहता हूँतवील उम्र की मेरी कोई दुआ न करे [6]ख़ुदा क़ुबूल करे आख़री दुआ ये…See More
yesterday
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"आदणीय नाथ सोनांचली साहिब प्रणाम, बहुत अच्छी कोशिश दिखाई देती है आपकी ग़ज़ल में और कुछ शे'र नए दौर कर लिए एक दम नए। पढ़ कर बहुत अच्छा लगा साहिब, शुक्रिया।"
Feb 25
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"आदरणीय आज़ी साहब बहुत ही उम्दा ग़ज़ल कही आपने। बहुत बधाई आपको इस ग़ज़ल के लिए। बे-क़रारी में कभी भी जाँ लुटाई न गई // यह मिस्रा खटक रहा है साहिब, 'कभी भी' यह उच्चारण में अटक रहा है। गौर कीजिएगा। आपका दिन शुभ हो।"
Feb 25
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"आदरणीय नीलेश जी नमस्कार  बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है, वाह!! आज फिर मुझको शब-ए-हिज्र दुआएं देंगीं* यह मिस्रा यूँ होना चाहिए, गौर कीजिए, साहिब और तीसरे शे'र पर ख़ास तौर पर दाद देता हूँ।।"
Feb 25
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-125
"आ,  लक्ष्मण धामी साहिब जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका ग़ज़ल तक आए और हौसला बढ़ाया, सादर"
Nov 28, 2020
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-125
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहिब, आदाब। ग़ज़ल पर आपकी आमद और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत शुक्रिया, सादर।"
Nov 28, 2020
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-125
"मोहतरम समर कबीर साहिब , आपका बहुत शुक्रिया आपना ववक़्त दिया आपने , मैं कुछ और कोशिश करता हूँ , दिल से शुक्रिया , सादर |"
Nov 28, 2020
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-125
"मोहतरम समर कबीर साहिब प्रणाम, ग़ज़ल पर आपकी आमद और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत शुक्रिया साहिब, "चारागर ढूँढ न पाए कोई तदबीर तभी" यूँ कह सकते हैं? या यूँ "चारागर ढूँढ न पाए कोई उपचार तभी" 'इतने खुद्दार थे कि अपने ही मालिक की…"
Nov 28, 2020
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-125
"आदरणीया रचना भाटिया  जी, प्रणाम बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें  देख बे-वजह तो तेरी आँखों ने बारिश नहीं की दिल से मिल कर तो कहीं माज़ी ने साज़िश नहीं की इस मत्ले का ऊला मिसरा बह्र में नहीं लग रहा  यूँ कर सकती हैं…"
Nov 28, 2020
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-125
"आदरणीय , dandpani nahak जी, प्रणाम आपकी आमद और हौसला अफ़ज़ाई का शुक्रिया। सादर।"
Nov 28, 2020
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-125
"आदरणीया ऋचा जी, प्रणाम आपकी आमद और हौसला अफ़ज़ाई का शुक्रिया। सादर।"
Nov 27, 2020
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-125
"2122 / 1122 / 1122 / 112 धूप से ओस की बूंदों ने गुज़ारिश नहीं कीमरना मंजूर था जीने की सिफ़ारिश नहीं की [1] चारागर ढूँढ न पाए कोई ईलाज तभी"हम ने बाज़ार में ज़ख़्मों की नुमाइश नहीं की" [2] एक ही शहर में हम दोनों का है घर फिर भीहमने इक दूसरे से…"
Nov 27, 2020
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-125
"सालिक गणवीर सर ,प्रणाम तरही मिसरे पर अच्छी ग़ज़ल कही आपने, बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 27, 2020

Profile Information

Gender
Male
City State
Motihari
Native Place
Bihar
Profession
Student
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मुझे तो सभी बोलते है कि लड़का भला भी नहीं तो बुरा भी नहीं है -'मीत'

Rupam kumar -'मीत''s Blog

दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')

बह्र:- 1212 1122 1212 112

दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे

किया है जो मेरे दुश्मन ने वो सगा न करे [1]

उसे है इल्म बिछड़ने से लोग टूटते हैं

तभी वो मोतियों को डोर से जुदा न करे [2]

बुज़ुर्ग हो गया हूँ ज़िंदगी से इसलिए भी

वो देख भाल करे पर मेरी दवा न करे [3]

नहीं है ख़ौफ़ समंदर में डूबने का मुझे

मगर यूँ क़र्ज़ में मरना पड़े ख़ुदा न करे [4]

मुहाल है ज़मीं से आसमान तक का सफ़र

बुलंदियों पे यूँ जा कर कोई गिरा न…

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Posted on March 3, 2021 at 9:23am — 3 Comments

ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')

बह्र- 2122 1122 1122 22(112)

ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा

और हँसते हुए दुनिया से गुज़र जाऊँगा [1]

जो सिला मुझ को मिला है यहाँ सच बोलने से

अब तो मैं झूट ही बोलूँगा जिधर जाऊँगा [2]

रात को ख़्वाब में आऊँगा फ़रिश्ते की तरह

और आँखों से तेरी सुब्ह उतर जाऊँगा [3]

ख़ून छन छन के निकलता है कलेजे से मेरे

रोग ऐसा है कि कुछ रोज़ में मर जाऊँगा [4]

सामना होने पे पूछेगा तू , पहचाना मुझे?

गर मैं पहचान भी…

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Posted on October 15, 2020 at 5:30pm — 12 Comments

हम उनकी याद में रोए भी मुस्कुराए भी (~रूपम कुमार 'मीत')

बह्र- 1212 / 1122 / 1212 / 22 (112)

अज़ाब-ए-हिज्र में सुख-दुख के गीत गाए भी

हम उनकी याद में रोए भी मुस्कुराए भी [1]

ख़ुदा ने ख़ल्क़ किया है चराग़ जैसा हमें

वही जलाए हमें फिर वही बुझाए भी [2]

अजीब साल ये गुज़रा हमारी जिंदगी में

ख़ुदा करे न दुबारा कभी फिर आए भी [3]

हमारे यार का अंदाज़-ए-इश्क़ सबसे जुदा

कभी हँसाए वो हमको कभी रुलाए भी [4]

गुलाब जैसे लबों से वो हमको चूमता है

निशान प्यार के सीने से फिर मिटाए…

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Posted on September 27, 2020 at 1:00am — 17 Comments

अब से झूटा इश्क़ नहीं करना जानाँ (-रूपम कुमार 'मीत')

बह्र-22/22/22/22/22/2

अब से झूटा इश्क़ नहीं करना जानाँ

और किसी को मत देना धोखा जानाँ [1]

जब आँखों को दरिया करने का मन हो

तब मेरी रूदाद-ए-ग़म सुनना जानाँ [2]

दिन से रात तलक मैं तुमको रोता हूँ

तुम भी मुझको आठ-पहर रोना जानाँ [3]

अपने हाथ के कंगन जा पर रखना तुम

वाँ पर मेरी ग़ज़लें मत रखना जानाँ [4]

तुम रिश्तों में मत ढूँडो ख़ुशियाँ सारी

सीखो ख़ुद से मिलकर ख़ुश होना जानाँ [5]

आज जला दी वो…

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Posted on September 16, 2020 at 5:30am — 10 Comments

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At 5:49pm on July 3, 2020, Chetan Prakash said…

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