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शह्र अपना है बंट गया देखो------ग़ज़ल

2122 1212 22

शह्र अपना ये बँट गया देखो
सिम्बलों से लिपट रहा देखो

देश की फिक्र की सजी अर्थी
जाति का है कफ़न चढ़ा देखो

अब सभी को ख़याल बस अपना
संकुचित दायरा हुआ देखो

बस वहीं पर ही बन रहे रिश्ते
है जहाँ कोई फ़ायदा देखो

जाति बस काहिलों का है मुद्दा
जो था इंसाँ सफल हुआ देखो

कर्म करने का नाम जीवन है
साफ गीता में यह लिखा देखो

दर्द के या खुशी के हों आँसू
शेर पंकज नें कर दिया देखो

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 5, 2018 at 7:00pm

आदरणीय विजय निकोरे सर बहुत बहुत बहुत आभार

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 5, 2018 at 7:00pm

आदरणीय गुरप्रीत सर बहुत बहुत आभार

Comment by vijay nikore on September 26, 2018 at 3:16pm

बहुत अच्छी गज़ल लिखी है, आदरणीय पंकज जी, हार्दिक बधाई

Comment by Gurpreet Singh on September 24, 2018 at 8:06am

आदरणीय पंकज कुमार जी ,  बहुत खूब अशआर कहे आपने ॥  इस बढ़िया ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 23, 2018 at 5:18pm
आदरणीय तेजवीर सर ग़ज़ल को आशीर्वाद प्रदान करने के लिए बहुत-बहुत आभार
Comment by TEJ VEER SINGH on September 22, 2018 at 12:21pm

हार्दिक बधाई आदरणीय पंकज जी।बेहतरीन गज़ल।

देश की फिक्र की सजी अर्थी
जाति का है कफ़न चढ़ा देखो

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 22, 2018 at 8:10am

आदरणीय मिर्ज़ा जावेद साहब, संशोधन किया था मैंने, फिर से कर देता हूँ.....वैसे यह ग़ल्ती रेख़्ता के कारण हुई है।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 22, 2018 at 8:09am

आदरणीय अजय सर बहुत आभार, आपके कहे अनुसार संशोधन कर दिया गया है।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 22, 2018 at 8:08am

आदरणीय सुररेन्द्र जी बहुत आभार

Comment by mirza javed baig on September 21, 2018 at 10:48pm

जनाब पंकज साहिब बहतरीन प्रयास के लिए मुबारकबाद 

लफ़्ज़ कफ़न को आपने कफ्ऩ बांध लिया हे देखिएगा ।

कृपया ध्यान दे...

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