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ताक रही गौरैया प्यासी - गीत

गौरैया है कितनी प्यासी

 

झुलस रहा तन, व्याकुल है मन,  

छायी है चहुँ ओर उदासी.

रख दो एक सकोरा पानी,

ताक रही गौरैया प्यासी.

 

एक घौंसला था छोटा सा,

उड़ गया प्रगति की आँधी में.  

नहीं भरोसा रहा किसी को,

उस गाँवों वाले गाँधी में.

 

तपते पत्थर नन्दन वन में,

झुलस रहे हैं वन के वासी.

 

नदियों का पानी खतरे में,

सिकुड़ रहे हैं रोज किनारे.

पुरातत्व की हुए धरोहर,

पोखर कूप-बावड़ी सारे.

 

लगे नलों पर लम्बी लाइन,

गली-गली में बारहमासी.

 

मिट्टी का घट चौराहे पर,

तपन सूर्य की झेल रहा है.

प्लास्टिक का कंटेनर घर में,

बोटल के सँग खेल रहा है.

 

महल बनाकर भी बुधिया को,

मिल पाती है रोटी बासी.

"मौलिक एवं अप्रकाशित "

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 24, 2018 at 5:40pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज'  जी शुभ संध्या , बहुत बहुत धन्यवाद आपका

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 24, 2018 at 5:39pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी शुभ संध्या , बहुत बहुत धन्यवाद आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 24, 2018 at 5:39pm

आदरणीय  Ajay Tiwari  जी शुभ संध्या , बहुत बहुत धन्यवाद आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 24, 2018 at 5:39pm

आदरणीय  डॉ छोटेलाल सिंह जी शुभ संध्या , बहुत बहुत धन्यवाद आपका 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 20, 2018 at 5:51pm

वाह आदरणीय शर्मा जी बहुत ही सुन्दर गीत् रचा है...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 19, 2018 at 6:03pm

आ. भाई बसंत जी, बेहतरीन गीत हुआ है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Ajay Tiwari on September 19, 2018 at 4:21pm

आदरणीय बसंत जी, एक और अच्छी गीत-प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई.

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on September 19, 2018 at 2:15pm

आदरणीय बसन्त कुमार शर्मा जी इस मनमोहक सृजन के लिए बहुत बहुत बधाई

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 18, 2018 at 5:23pm
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on September 18, 2018 at 2:41pm

आद0 बसन्त कुमार शर्मा जी सादर अभिवादन। बहुत बेहतरीन और सरस रचना हुई है। बहुत बहुत बधाई आपको।

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