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ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त

अभी भी तुमसे मिलने के कई अरमान बाक़ी हैं ,

मेरी आबादियों के अब तलक निशान बाक़ी हैं।

मैं नंगे पैर शोलों पर अभी भी चल रहा लेकिन ,

मेरे पांवों के छालों में हलक तक जान बाक़ी है।

गले में कस गयीं हैं रस्सियाँ फांसी के फंदे की ,

मगर जिन्दा हूँ क्योंकि मौत का फर्मान बाक़ी है।

फ़क़त कुछ धुप से माना कि मैं सूखता समंदर हूँ ,

मगर अश्कों की बूंदों में बहुत अहजान बाक़ी हैं।

भले ही खाक में मिलने लगा है आसियाँ मेरा ,

मगर इस खंडहर में अब तलक गुमान बाक़ी है।

सिवाए गर्द के क्या कुछ दिया ऐ जिंदगी मेरी ,

हाँ इस धुंध के भी मुझपे कुछ अहसान बाक़ी है।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Mohit mishra (mukt) on June 15, 2018 at 8:58pm

आदरणीय बृजेश जी ,
हौसलाअफजाई का शुक्रिया

Comment by Mohit mishra (mukt) on June 15, 2018 at 8:57pm

आदरणीया रक्षिता सिंह जी नमस्कार ,
आपकी बहुमूल्य टिप्पड़ी के लिए बहुत बहुत आभार

Comment by Mohit mishra (mukt) on June 15, 2018 at 8:55pm

आदरणीय गुमनाम जी ,
रचना पर उपस्थिति और घनावलोकन का आभार। मुझे ग़ज़ल के अरकान नहीं समझ आते अतः त्रुटि सम्भव है। आगे की कोशिशों में और बेहतर करने का प्रयास रहेगा

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 15, 2018 at 4:18pm

अच्छी कोशिश भाई..अरकान नहीं लिखे हैं आपने..जो आदरणीय गुमनाम जी ने बताया वही हैं तो उनकी बातों का संज्ञान लें..

Comment by Rakshita Singh on June 15, 2018 at 3:19pm

आदरणीय मोहित जी नमस्कार,
बहुत बेहतरीन गजल ... हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 12, 2018 at 1:49pm

भाई जी अच्छी ग़ज़ल हुई है.... क्या अरकान 1222 1222 1222 1222 तो अरमान-निशान क़ाफ़िए मेल नहीं खाते । गुणीजन भी कुछ कहें.....

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