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पार्षद वाली गली (लघुकथा)


"क्यों कमला बाई, उस गली में सफाई नहीं की तुमने आज?"दरोगा ने पूछा।
"मैंने तो अपनी सब गलियों में झाड़ू लगाई है साब,आप किस गली की बात कर रहे हो?"
"कल ही तो दिखाई थी वो गली तुझको, अपने पार्षद साहब वाली गली।"
"पर वो तो मेरे हिस्से की गली नहीं है साब, वहां तो श्याम जाता है बरसों से।"
"मैंने बताया तो था आज से तेरा तबादला उस तरफ़ कर दिया गया हैं।"
"पर क्यों?"
"तेरे काम से खुश होकर पार्षद साहब ने ही ऐसा कहा है।"
" अच्छा अच्छा अब समझ में आया। कल मैंने चप्पल जो मारी थी पार्षद के चौकीदार को, हरामजादा बदतमीज़ी कर रहा था मुझसे।"
"हा हा हा।" दरोगा हँसने लगा।
" साब,सफाई वाली हूँ खूब समझती हूँ तुम्हारा इशारा। कसम से जरूरत पड़ी तो किसी की बली चढ़ा दूंगी और मेरे हाथ की सफाई तो आप जानते ही हो।"
आंखों से बरस रहे अंगारों ने दरोगा के पसीने छुड़ा दिये थे।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on December 28, 2017 at 5:58pm

बहुत बढ़िया रचना, बधाई आ कल्पना भट्ट जी

Comment by Mahendra Kumar on December 18, 2017 at 9:29pm

वाह! उम्दा लघुकथा. दिल से बधाई प्रेषित है. सादर.

Comment by Samar kabeer on December 18, 2017 at 1:59pm

बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,बढ़िया लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Neelam Upadhyaya on December 18, 2017 at 12:18pm

आदरणीय कल्पना जी, बहुत ही अच्छी रचना । बधाई।

Comment by Chandresh Kumar Chhatlani on December 17, 2017 at 1:44pm

बहुत बढ़िया रचना कही है आदरणीय कल्पना दी, बहुत-बहुत बधाई इस सृजन हेतु

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 17, 2017 at 12:12am

//..सफाई वाली हूँ खूब समझती हूँ तुम्हारा इशारा।// ... बहुत बढ़िया प्रस्तुति। हार्दिक बधाई आदरणीया कल्पना भट्ट जी।

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