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जड़ें (लघुकथा) -सुनील वर्मा

"सुन न यार..क्यूँ इस ट्रेफिक जाम में पसीने बहा रहा है? सायरन ऑन कर और जगह बनाता चल.." खाली एंबुलेस में चालक के पास वाली सीट पर बैठे उसके दोस्त ने समझाया|

"नही भाई..पाँच दस मिनिट देर से ही सही| हमें किस बात की जल्दबाजी है..? गाड़ी में कोई मरीज थोड़े ही लेटा हुआ है, खाली ही तो है|" चालक ने अपने दोस्त से कहा|

"अररे तो बाहर लोगों को थोड़े ही पता है कि पीछे मरीज लेटा है या नही" दोस्त ने उसे अपना अतिरिक्त ज्ञान दिया|

असर हुआ और सामने रेंगते हुए ट्रेफिक को देखकर चालक का हाथ सायरन ऑन करने के लिए आगे बढ़ा परंतु अगले ही पल कुछ सोचकर वापस स्टेयरिंग पर आ गया|

"क्या हुआ..?" दोस्त ने चौंकते हुए पूछा|

चालक ने 'रियर व्यू मिरर' को सही करते हुए कहा "भाई, इस गाड़ी में इसका 'विश्वास' लेटा है| मुझे डर है कि कहीं बिना जरूरत के सायरन बजाया तो वह न मर जाये|"

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on September 21, 2017 at 6:28pm
बात तो बहुत साधारण सी है पर कहने का अंदाज़ लाजवाब है। विश्वास को ज़िंदा रखना ही बड़ी बात है , बधाई , सुनील जी , सादर।
Comment by Nita Kasar on September 21, 2017 at 5:03pm
कथा में नयापन लिये अलग ही विषय उठाया है ।आपने ।अंतिम पंक्तियों में मन छू लिया ।अधिकतर एेसा ही होता है ।बधाई आद० सुनील वर्मा जी ।
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on September 21, 2017 at 4:48pm

बहुत उम्दा कथा भाई सुनील वर्मा जी, वास्तव में विश्वास एक ऐसी चीज है जो एक बार खोने के बात दुबारा नहीं लौट पाती... हार्दिक बधाई इस लघुकथा के लिए भाई जी ....सादर

Comment by Mohammed Arif on September 19, 2017 at 9:21am
आदरणीय सुनील वर्मा जी आदाब, सशक्त और बेहतरीन कथानक । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 18, 2017 at 3:54pm

आदरणीय सुनील  वर्मा  जी, सुन्दर प्रस्तुति  बहुत बधाई ! सादर 

Comment by Samar kabeer on September 18, 2017 at 3:05pm
जनाब सुनील वर्मा साहिब आदाब,हमेशा की तरह बहुत उम्दा लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 18, 2017 at 2:53pm

बढ़िया लघुकथा कही है आपने आदरणीय सुनील भैया | विषय भी नया है बहुत बहुत बधाई |

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on September 18, 2017 at 1:11pm
चालक ने 'रियर व्यू मिरर' को सही करते हुए कहा "भाई, इस गाड़ी में इसका 'विश्वास' लेटा है| मुझे डर है कि कहीं बिना जरूरत के सायरन बजाया तो वह न मर जाये|"

वाह वाह भाई सुनील जी,वाह बढ़िया लघुकथा कहीं।बहुत उम्दा।बधाई लीजिये

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