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हर मुख हिंदी कब गायेगा ?:-मोहित मुक्त

विश्व पटल की बात तो छोडो ,
भारत के सर्वस्व भूमि पर ,
त्याग आपसी रंजिश को ,
हर मुख हिंदी कब गायेगा ?
जाने वह क्षण कब आएगा ?

विदेशी भाषाओं से कबतक ,
टूटेगा सबका सम्मोहन ?
हेमलेट को छोड़ जन-मन ,
मेघदूत कब गायेगा ?
जाने वह क्षण कब आएगा ?

निराला, दिनकर, प्रसाद से ,
जिसके प्रखर सपूत हुवे ,
उस माँ को सम्मान दिलाने ,
नव-भारत कब जग पायेगा ?
जाने वह क्षण कब आएगा ?

गर्वान्वित होगा भारत-वर्ष ,
कब हिंदी में बोल-बोलकर ?
विश्व शिखर सम्मेलनों में ,
कब हिंदी गान गाया जाएगा ?
जाने वह क्षण कब आएगा ?

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Mohit mishra (mukt) on September 19, 2017 at 8:05pm

आदरणीय अफ़रोज़ जी उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया 

Comment by Mohit mishra (mukt) on September 19, 2017 at 8:04pm

आदरणीय समर सर अभी इतना परिपक्व नहीं हूँ ,पर आप जैसे पैनी निगाहों वाले गुणीजनों के छाया तले हूँ आज नहीं तो कल सुधर हीं जाऊंगा। त्रुटिअवलोकन और सुधार के लिए शुक्रिया 

Comment by Afroz 'sahr' on September 19, 2017 at 11:46am
जनाब मोहित जी सुंदर रचना पर बधाई स्वीकार करें ।आदरणीय समर सहब के सुझाव क़ाबिल ए गो़र होते हैं ।सादर,,,,
Comment by Samar kabeer on September 19, 2017 at 11:38am
आप हिन्दी के ग़म में घुले जा रहे हैं,और ख़ुद यहाँ 'हिन्दी'को 'हिंदी'लिख रहे हैं ,इसका सही उच्चारण "हिन्दी" है ।
Comment by Mohit mishra (mukt) on September 18, 2017 at 11:25pm
यहीं तो मेरी भी कामना है। आशा है ऐसे रचनाकार और ऐसी रचनाएँ नवीनता के साथ हिंदी के माध्यम से सामने आएंगी। आप भी दुआ करें ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 18, 2017 at 10:14pm

मातृभाषा आपकी है ..हर प्रदेश की नहीं.. लोगों पर अपनी पसंद थोपी नहीं जा सकती.. सम्मान पाना है तो ऐसी रचनाएँ रचनी पड़ेंगी कि लोग मजबूर हो जायं पढने के लिए .

Comment by Mohit mishra (mukt) on September 18, 2017 at 8:21pm
आ. निलेश जी मै सिर्फ हिंदी के सम्मान की बात कर रहा हूँ जो कुछ प्रदेशों में समाप्त हो रहा है और english के महिमामंडम में खो सा गया है। मैं आपकी बात से इत्तेफाक रखता हूं , हमें भी अन्य भाषाओं के महत्ता को स्विकारना चाहिये। पर विदेशज भाषाओं के प्रभाव में मातृभाषा का असम्मान क्या सहिष्णुता के नाम पर स्विकार्य है? सादर
Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 18, 2017 at 12:06pm

आ. मोहित जी,
भारत में हिंदी से कई गुना समृद्ध भाषाएँ हैं. तमिल संस्कृत से भी प्राचीन और समृद्ध है. बंगाली साहित्य अपने आप में परिपूर्ण है. मराठी 
किसी से कम नहीं है, गुजराती, कन्नड़, तेलुगु , मलयालम अपने आप में संस्कृति है. कश्मीरी और पंजाबी का साहित्य जगप्रसिद्ध है ... 
उर्दू का लोहा दुनिया मानती है .....उड़िया, असमिया ,राजस्थानी , बृज ,मैथिलि भोजपुरी मालवी और अन्य बोलियाँ अपने आप में बहुत समृद्ध हैं..
ऐसे विविधता वाले महा देश में एक भाषा सबपर थोपना ठीक नहीं है.
व्यवस्था में बदलाव  पाकिस्तान ने किया था जब पंजाबी, सिन्धी, सरायकी, बंगाली आदि  पर उर्दू थोपी गयी थी... नतीजे में बंगलादेश  बन गया.
हमारे संविधान निर्माताओं ने सभी संस्कृतियों का ख़याल कर के किसी एक    भाषा को राष्ट्रभाषा नहीं माना बल्कि लगभग 26 भाषाओँ को  राजभाषा   का दर्ज़ा दिया है. यही विविधता हमारे गुलदस्ते की जान है...
हिंदी के प्रति आपका प्रेम मैं समझता हूँ लेकिन हम हिंदी भाषियों को   अन्य भाषाओं के प्रति भी  उतना ही सहिष्णु होना चाहिये.
सादर 

Comment by Mohit mishra (mukt) on September 17, 2017 at 10:14am

आदरणीय नीलेश जी रचना पर उपस्थिति के लिए ह्रदय से आभार। मेरा आशय केवल राष्ट्रगान गाने से नहीं था बल्कि भारत के सम्पूर्ण भूभाग पर सम्मान भाव से हिंदी को अपनाने से था। आज भी हिंदी भाषी लोगों को हिंदी भाषी क्षेत्रों से इतर प्रदेशों में हेय दृष्टि से देखा जाता है ,मैं उस व्यवस्था के बदलाव की बात कर रहा हूँ। सादर 

Comment by Mohit mishra (mukt) on September 17, 2017 at 10:09am

आदरणीय  गिरिराज भंडारी जी रचना पर गहन राय ब्यक्त करने का शुक्रिया 

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