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आएँगे जी आएँगे, अच्छे दिन यूँ आएँगे ...गीत / शून्य आकांक्षी

आएँगे  जी   आएँगे, अच्छे  दिन  यूँ  आएँगे |
जाएँगे  जी  जाएँगे, भद्दे  दिन  भग  जाएँगे || 
 
योगासन    प्रारम्भ    करो | 
आँख, कान, मुँह बन्द करो | 
पेट   भींचकर   भीतर   को ,
साँसों   को   पाबन्द   करो | 
 
उदर-पीठ दोनों हों एक, तब उनको हम भाएँगे | 
आएँगे  जी   आएँगे, अच्छे  दिन  यूँ  आएँगे || 
 
क्यों  मेहनत तुम करते हो | 
दिन - भर  खटते रहते  हो | 
करो    राजनैतिक    खेती ,
भूख, प्यास क्यों  सहते हो | 
 
मंत्री  बन पूँजीपति भी, तलवे तब सहलाएँगे | 
आएँगे  जी   आएँगे, अच्छे  दिन यूँ  आएँगे || 
 
तेरी   पेंशन   काट  रहे | 
खुद जीवन-भर चाट रहे | 
उनकी इच्छा सदा यही  ,
खड़ी  हमारी  खाट  रहे | 
 
कुछ कर जीने को साथी, वरना  जी ना पाएँगे | 
आएँगे  जी   आएँगे, अच्छे  दिन  यूँ  आएँगे ||  
.
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 14, 2017 at 8:31pm

आदरणीय  Mohammed Arif जी,
गीत पर सार्थक टिप्पणी करने और बधाई देने के लिए आपका हार्दिक आभार | इसी प्रकार प्रेम बनाए रखिएगा | 

Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 14, 2017 at 4:15pm

आदरणीय Samar kabeer साहब,
आपकी सराहना पाकर मेरे गीत का लेखन सफल हुआ | आपका हार्दिक आभार | 

Comment by Ravi Shukla on August 14, 2017 at 2:56pm

आदरणीय चंद्र मोहन जी बहुत बहुत बधाई इस सुंदर गीत के लिये । अतुकांत के आगे गीतो में भी आपकी कलम चलते देख कर खुशी हुई जितना भी साथ रहा आपके अतुकांत से ही परिचय हो पाया था । सादर

Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 14, 2017 at 12:30am

आदरणीय  Niraj Kumar जी,
आपकी बेहतरीन, सार्थक और मेरे लेखन को प्रोत्साहित करती टिप्पणी पाकर मन प्रसन्न हो गया | आपका बहुत-बहुत शुक्रिया | इसी प्रकार प्रेम बनाए रखिएगा | 

Comment by Mohammed Arif on August 13, 2017 at 6:35pm
आदरणीय सी.एम.उपाध्याय जी आदाब, अच्छे दिन पर करारा व्यंग्यपूर्ण गीत की सौगात ।अच्छे दिन का झुनझुना ख़ूब बजाया प्रधान सेवक जी मगर जनता से संवाद कब करते हैं ,किसानों की ख़ुदकुशी पर चुप रहते हैं ,नफ़रत की हिंसा और लक्षित हिंसा पर बोलने के बजाय विदेशों की सैर पर ऐश करने निकल जाते हैं । अब अच्छे दिन कैसे आयेंगे , हमें तो अब भी इंतज़ार है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Samar kabeer on August 13, 2017 at 6:28pm
जनाब उपाध्याय जी आदाब,बहुत अच्छा लगा आपका गीत,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Niraj Kumar on August 13, 2017 at 5:12pm

आदरणीय शून्य आकांक्षी जी,

बहुत अच्छा गीत ! मारक व्यंग ! साहसपूर्ण !

जितनी दाद दी जाय कम है.

इस गीत से पता चलता है कि साहित्यकार को सत्ता का शाश्वत प्रतिपक्ष क्यों कहते हैं .

सादर 

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