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कमज़ोर आदमी (लघुकथा) -सुनील वर्मा

बेहद कमजोरी के बावजूद सुगणा ने कंधो के सहारे जोर लगाकर नीचे सरक आये अपने सिर को तकिये पर टिकाया| अधखुली आँखों से खुद को देखा| रक्तस्राव की अधिकता के कारण हर बार वह पहले से ज्यादा अशक्त होती जा रही थी| तीन बार की ज़चगी के बाद अब उसमें और हिम्मत नही बची थी| बात करने पर उसके पति ने उसकी बात मान भी ली थी, मगर शर्त थी की आवश्यक ऑपरेशन वह ही करवायेगी| आज उसी ऑपरेशन के बाद वह बिस्तर पर पड़ी थी| शरीर पहले से ही सुन्न था, अब दिमाग भी सुन्न हो चुका था|
गहरी फूँक छोड़ते हुए उसने अपनी गर्दन पास वाले बेड पर लेटी महिला की तरफ घुमाई| दो दिन एक ही जगह साथ रहने से हुई आपसी बातचीत के बाद दोनों अब लगभग सहेली बन चुकी थी| आज जब उस महिला के परिजन उसका सामान समेट रहे थे, तो उसने हैरान होकर पूछा "अररे आपको छुट्टी मिल भी गयी! आप भी तो अपना आपरेशन.."
"हाँ, पहले तो मैं ही करवाने का सोच रही थी, लेकिन रिपोर्ट्स में मेरी शारिरीक दुर्बलता के बारे में पढ़कर अब यह ऑपरेशन मेरे पति करवायेगें|"
"हाय राम, इससे आपके मरद को कोई कमजोरी न होगी..?" सुगणा पूछते हुए सकुचाई|
"किसने कहा..? बल्कि पुरूष नसबंदी में तो अपेक्षाकृत कम खतरा होता है|" कहते हुए महिला मुस्कुराई|
जवाब मिश्रित सवाल सुनकर सुगणा कुछ दिन पीछे चली गयी| उसने गर्दन सीधी करके छत पर टिका दी| अपने पति के बोल उसके कानों में उतर आये|
"तुझे पता है नसबंदी मरद को कमजोर बना देती है और अगर आदमी कमजोर होगा तो घर कैसे चलेगा ? औरत का क्या है! उसे तो सारे दिन घर में ही रहना होता है|"
"अररे बता न..किसने कहा ?" महिला ने दोबारा पूछा
"एक कमज़ोर आदमी ने.." सुगणा ने छत से नज़र हटाकर महिला की तरफ देखते हुए कहा|

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Mahendra Kumar on July 20, 2017 at 9:46pm

पुरुषवादी सोच को इस लघुकथा में बहुत बढ़िया तरीके से उभरा है आपने आ. सुनील जी. शीर्षक से पूरी तरह न्याय हुआ है. मेरी तरफ़ से हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Samar kabeer on July 16, 2017 at 6:43pm
'ज़्यादा'ऐसे नहीं यूँ "ज़ियादा" ।
Comment by Mohammed Arif on July 16, 2017 at 5:25pm
आदरणीय सुनील वर्मा जी आदाब, नसबंदी की पृष्ठभूमि पर लिखी सहज प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई । कुछ वर्तनीगत अशुद्धियों पर ध्यान दिलाना चाहूँगा जैसे-कमजोरी-कमज़ोरी, कंधो-कंधों, दिमाग-दिमाग़,ज्यादा-ज़्यादा, शारिरीक-शारीरिक,करवायेगें-करवायेंगे आदि । देखिएगा ।
Comment by Hari Prakash Dubey on July 16, 2017 at 4:18pm

सुन्दर लघुकथा ,हार्दिक बधाई श्री Sunil Verma जी ! 

Comment by Samar kabeer on July 16, 2017 at 3:50pm
जनाब सुनील वर्मा जी आदाब,हमेशा की तरह बहुत उम्दा लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 16, 2017 at 3:31pm

एक मर्द की छोटी सोच वाह बेहतरीन कथा और बेहतरीन तंज़ हुआ है आदरणीय सुनील भैया | हार्दिक बधाई |

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