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ऑक्सीजन (लघुकथा ) -सुनील वर्मा

रविवार का दिन था| अखबार पढ़ने के बाद कमलेश जी बरामदे में बैठे रेडियो पर गानें सुन रहे थे| एकाएक उनके कानों में इकतारे की धुन के साथ साथ लोक संगीत के बोल घुल गये|
आँखे खोलकर उन्होने आवाज की दिशा में देखा| दरवाजे पर खड़ा एक बूढ़ा याचक कुछ गाते हुए इकतारा बजा रहा था| वह दरवाजे तक गये और उसे वहीं बाहर बने चबूतरे पर बैठने के लिए कहा|
"बहुत अच्छा गाते हो| कहाँ से हो?" उसके बैठते ही उन्होनें सवाल किया|
"बहुत दूर से हैं बाबूजी| हमारे पुरखे अपने जमाने के बहुत बड़े लोक कलाकार थे| बस उनसे ही थोड़ा बहुत सीख लिया|" बूढ़े ने इज्जत मिलते ही अपना परिचय दिया|
"तो यहाँ शहर में कैसे..?" कमलेश जी ने अगला प्रश्न किया|
"अब इस कला की कहाँ कोई कद्र है बाबूजी ? गाँव में पेट भरना मुश्किल हो गया और कोई दूसरा काम हमें आता नही इसलिए यहाँ शहर में इसके सहारे माँगकर गुजारा कर लेते हैं|" बूढ़े ने माथे का पसीना पूछा|
"तो सुना दो कुछ..." कहते हुए कमलेश जी भी वहीं चबूतरे पर बैठ गये|
बूढ़े ने पहले तो हैरानी से देखा फिर आश्वस्त होने पर संगीत शुरू किया| उसे गाते देख उसके आसपास और लोग भी जुड़ने लगे| अपनी आँखें मूंदकर वह लगभग आधे घंटे तक अपने इकतारे के साथ लोक धुनें बिखेरता रहा| समाप्ति पर आँखे खोली तो आसपास तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी| कमलेश जी ने जेब से निकालकर उसे पचास का नोट देना चाहा|
बूढ़े ने हाथ जोड़कर मना करते हुए कहा 'बाबूजी, आया तो पैसों की आस में ही था मगर अब पैसे नही लूँगा|'
"अररे मगर...तुम पैसों के लिए ही तो यह बजाते हो|"
बूढ़े की आखों में आँसू आ गये| इकतारे को माथे से लगाते हुए वह रूँधे गले से इतना ही कह पाया "ज्यादा नही तो कम..पैसे तो रोज मिल ही जाते हैं| मगर आज एक कलाकार को उसका सम्मान मिला है बाबूजी.."
कमलेश जी ने नोट उसके कुर्ते की जेब में रखते हुए कहा "रख लो काम आयेगें...और हाँ, अगले रविवार को भी जरूर आना.."
बूढ़े की आँखे बता रही थी कि सम्मान का ऑक्सीजन मिलते ही उसकी मरती हुई कला उसमें दोबारा जीवित हो रही थी|

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 8, 2017 at 6:28am

सुंदर एवं प्रेरक प्रस्तुति ! बहुत बधाई।


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Comment by rajesh kumari on July 16, 2017 at 9:26pm

बहुत शानदार लघु कथा लिखी है आद० सुनील जी बहुत बहुत बधाई आपको .

Comment by Hari Prakash Dubey on July 16, 2017 at 6:35pm

सुन्दर प्रस्तुति सुनील जी, बधाई प्रेषित ! सादर 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 16, 2017 at 4:01pm

हमेशा की तरह एक बेहतरीन लघुकथा हुई है आदरणीय सुनील भैया | हार्दिक बधाई आपको| बहुत अच्छा लग रहा है आप को पढ़कर |

Comment by Ravi Prabhakar on July 13, 2017 at 9:25pm

भाई सुनीज जी, लघुकथा में निहित सूक्ष्‍म तथ्‍य जिस प्रखरता से उभर कर सामने आया हे वह प्रशंसनीय है । लघुकथा का शीर्षक व शिल्‍प भी बहुत प्रभावित करता है । शुभकामनाएं

Comment by Sunil Verma on July 12, 2017 at 8:53pm

निवेदन नहीं आदरणीय आप तो आदेश देने का हक़ भी रखते हैं।
दरअसल मैं सिर्फ 'लघुकथा' ही लिखता हूँ, अन्य विधाओं में मेरी जानकारी शून्य है। माह के अंत में होने वाली लघुकथा गोष्ठी में पिछले एक साल से लगातार उपस्थित होता रहा हूँ। इस बार समय पर अपनी लघुकथा तैयार न हो पाने के कारण कथा तो पोस्ट नहीं कर पाया फिर भी मैंने अपनी गोष्ठी में आने वाली कथाओं पर अपनी टिप्पणियाँ रखी थी। मैं पूरी कोशिश करूँगा की अगली बार आपको कोई शिकायत का मौका न दूँ
आदरणीय महेंद्र कुमार जी, त्रुटि की तरफ ध्यान दिलाने के लिए बहुत बहुत आभार। हालाँकि मेरा ध्यान इस और गया भी, मगर तब तक कथा मंच द्वारा स्वीकृत हो चुकी थी। आपसे इसी स्नेह की उम्मीद है.. कृपया बनाये रखियेगा

Comment by Mahendra Kumar on July 12, 2017 at 8:33pm

आ. सुनील जी, बहुत बढ़िया लघुकथा लिखी है आपने. निश्चित ही सम्मान रुपी ऑक्सीजन की ज़रूरत हर कलाकार को होती है. इस ऑक्सीजन की ज़रूरत इस मंच पर हम जैसे नए रचनाकारों को भी है. उम्मीद है आप अपनी सक्रियता बनाये रखेंगे. इस लघुकथा के लिए ढेर सारी बधाई स्वीकार कीजिए. कुछ टंकण त्रुटियाँ हैं, उन्हें देख लीजिएगा जैसे, //बूढ़े ने माथे का पसीना पूछा|// "पोछा" सादर.

Comment by Samar kabeer on July 11, 2017 at 10:40pm
जनाब सुनील वर्मा जी आदाब,बढ़िया लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
एक निवेदन ये है कि कृपया मंच पर अपनी सक्रियता बनाये रखें ,ये हमारी ज़िम्मेदारी है ।
Comment by Nita Kasar on July 11, 2017 at 9:25pm
कला रे क़द्रदान मिल ही जाते है,सार्थक कथा के लिये बधाई आद० सुनील वर्मा जी ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 11, 2017 at 8:49pm

बढ़िया सुनील जी

और हाँ, अगले रविवार को भी जरूर आना.."-----क्या यह आवश्यक था . कथानक की पृष्ठिभूमि में कला को रोजरोज तो आदर मिलने से रहा . सादर

कृपया ध्यान दे...

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