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पाग़ल कहीं का - लघुकथा (सुनील वर्मा)

फोन उठाते ही प्रतीक ने अपनी बहन लतिका से उसके हालचाल पूछे तो बदले में जवाब मिश्रित प्रतिप्रश्न आया "बस ठीक हूँ..तू सुना|"
"मैं भी ठीक हूँ | वह अंकिता की डिलीवरी का समय नजदीक है इसलिए थोड़ा सा व्यस्त हूँ |"
"हाँ भइई..पापा जो बनने वाला है| व्यस्त तो होगा ही, मगर अपनी व्यस्तता में बच्चे की बुआ को मत भूल जाना| लड़का हुआ न, तो नेग़ में सोने की अँगूठी लूँगी|"
"जी दीदी..अँगूठी आप से बढकर है क्या?" प्रतीक ने बहन की हाँ में हाँ मिलाई फिर कुछ रूक कर आगे कहा "दीदी, मैं यहाँ शहर में अकेला हूँ, अगर समय निकालकर आप कुछ दिन मेरे यहाँ..."
"न बाबा न..! तेरे जीजाजी को तू जानता ही है| मेरे अलावा उनको किसी के हाथ का खाना तक पसंद नही है| मेरे लिए आना मुश्किल होगा|" फिर कुछ सोचते हुए उसने आगे कहा "तू अपनी सास को क्यूँ नही बुला लेता..?"
"वह तो स्वंय बीमार रहती हैं..इतना सब कुछ कैसे.."
"अररे मगर वह माँ है भाभी की..तू देख लेना सब कर लेगीं" लतिका ने जोर देकर कहा|
"आप भी तो मेरी..." बात पूरी होने से पहले ही दूसरी तरफ से आवाज आयी "तू ऑफिस से पन्द्रह बीस दिन की छुट्टियाँ क्यूँ नही माँग लेता ?"
"दीदी, कभी किसी आदमी को पितृत्व अवकाश मिलते हुए देखा है आपने..?" उसके शब्दों में जैसे तंज था
"हम्मम...तो फिर कुछ दिनों के लिए कोई 'मेड' रख ले..."
"आप तो जानती हैं कि शहर में खर्चे..." अपनी बहन द्वारा टालमटोल करने पर प्रतीक ने खुद को संयत किया मगर फिर भी गले की भर्राहट को छुपा नही पाया
"अरररे....तू रो रहा है ? पागल कहीं का..! आदमी होकर रो रहा है |"
"नही दीदी, वह तो बस ऐसे ही.." प्रतीक ने खुद को संभाला और आगे कहा "खैर छोड़िये| आप परेशान मत होईये| मैं करता हूँ कोई व्यवस्था.."
फोन रखने के भाव सुनते ही दूसरी तरफ से आवाज आयी "अपना ध्यान रखना..और सुन मेरी अँगूठी मत भूलना.."
लगभग नीचे आ चुके मोबाईल को दोबारा कान पर रखते हुए वह सिर्फ इतना ही कह पाया "जी दीदी |"

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sunil Verma on Wednesday
एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा करने हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद| मैं इस बारे में पूर्णतया अनभिज्ञ था|
Comment by Mohammed Arif on Wednesday
आदरणीय सुनील वर्मा जी आदाब, ब्लाग पोस्ट पर आपकी पहली बार लघुकथा पढ़ रहा हूँ । बहुत बढ़िया कथानक चुना । लेकिन इस कथानक पर मैं सैकड़ों लघुकथाएँ पढ़ चुका हूँ। कथानक में कुछ नयापन नहीं है । हाँ, अलबत्ता कथानक कसावट लिए ज़रूर है ।। संवादों भी अच्छे हैं । दूसरी ख़ास बात पर मैं आपका ध्यान आकृष्ट करवाना चाहूँगा कि आपने कहा है कि"दीदी, कभी किसी आदमी को पितृत्व अवकाश मिलते हुए देखा है आपने ?"...यह कथन सरासर ग़लत है । आजकल शासकीय सेवकों को भी 15 दिन का अवकाश मिलता है । म.प्र.शासन भी यह लाभ अपने सेवकों को दे रही है । शायद आप मेरी बात से सहमत होंगे । बधाई स्वीकार करें ।

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