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कितना सुकून है तेरी यादों की छाँव में

2212 1212 2212 12

कितना सुकून है तेरी यादों की छाँव  में

लगता है जैसे बैठे हैं जन्नत की ठाँव में

 

फिरते हैं अब तलाश में जिसकी यहाँ वहाँ

मिलता था वो सुकूँ कभी पीपल की छाँव  में

 

आँखों को इंतिज़ार है आने का आपके

मुड़कर तो आइये ज़रा अपने ही गाँव में

 

कुछ इस्तेमाल कीजिये अपना दिमाग भी   

किसको मिला है फायदा नफरत के दाँव में

 

अब क्या सुबूत दें तुम्हें जद्दोजहद की हम

छाले पड़े हैं आज तक हम सब के पाँव में

 

मुझको मिटाने आए थे मिलजुल के लोग सब

खुद ही उलझ के रह गए अपने ही दाँव में

 

पुछल्ला

फुरसत किसे है बाँट ले खुशियों को अब यहाँ

उलझा हुआ है हर कोई नफरत के दाँव में

 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by Lajpat Rai Garg on May 24, 2017 at 10:21am

बधाई.अच्छी ग़ज़ल है.

 

Comment by Mahendra Kumar on May 22, 2017 at 8:41am

बढ़िया ग़ज़ल है आदरणीय नादिर जी हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Gurpreet Singh on May 19, 2017 at 2:00pm

बहुत अच्छी ग़ज़ल है आदरणीय नादिर खान जी,,, मतला बहुत ही खूबसूरत है 

Comment by नादिर ख़ान on May 18, 2017 at 11:07am

शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी ...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 16, 2017 at 9:39pm

आदरनीय नादिर खान भाई , बहुत अच्छी गज़ल कही है ... मुबारकबाद कुबूल करें ।

 

Comment by नादिर ख़ान on May 16, 2017 at 12:29am

जनाब समर कबीर साहब हौसला अफजाई और मार्ग दर्शन के लिए बहुत शुक्रिया आपका हमने इस्तेमाल को (2221) ले लिया था इसलिये ये त्रुटि आ गई शायद सही उच्चारण इस्तमाल (2121) है । "कुछ तो समझ  का अपनी ज़रा इस्तेमाल कर" इसमें भी लय बिगड़ रही है या  हम  समझ नहीं पा  रहे  हैं । ज़रा 12 के जगह ऐसा शब्द लेना होगा जो 22 हो....

Comment by नादिर ख़ान on May 16, 2017 at 12:18am

आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ साहब, आदरणीय श्याम वर्मा जी आदरणीय सतविन्द्र जी हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया ....

Comment by सतविन्द्र कुमार on May 15, 2017 at 6:47pm
आदरणीय नादिर खान जी,हारदिक बधाई इस उम्दा गजल के लिए!
Comment by Samar kabeer on May 15, 2017 at 6:13pm
जनाब नादिर खान साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
दूसरे शैर के सानी मिसरे में 'शुकूँ' को "सुकूँ" कर लीजिए ।

'कुछ तो समझ का अपनी इस्तेमाल कीजिये'
ये मिसरा ली में नहीं है,इसे यूँ कर लें :-
"कुछ तो समझ का अपनी ज़रा इस्तेमाल कर"
Comment by Shyam Narain Verma on May 15, 2017 at 12:12pm
बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल ....हार्दिक बधाई ! 

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