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हमारे हौसले अब तक कहाँ जालिम ने देखे हैं - अनुराग

मुफ़ाईलुन  मुफ़ाईलुन  मुफ़ाईलुन  मुफ़ाईलुन

हमारे हौसले अब तक  कहाँ जालिम ने देखे हैं

चटानें  टूट जाती  हैं  जहाँ  हम  पाँव रखते हैं

 

हमी  ने फूल  महकाए हैं सहराओं  के सीने में

हमी  ने  बंजरों  के सूने  दिल  में  बीज बोये हैं

 

हमी सर मार  के  मरते  रहे  हैं अपने तेशे पर

हमी  ने  पर्वतों  को  काट  के  रस्ते  बनाये  हैं

 

हमी ने आँधियों की सरकशी के रूख को मोड़ा है

हमी ने  जिद्दी  तूफानों  के  जालिम पंख तोड़े हैं

 

हमी हर हाल में उनको यहाँ सच करके देखेंगे

हमी ने  ज़िन्दगी की  बेहतरी  के ख्वाब देखे हैं

"मौलिक/अप्रकाशित" 

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Comment by Anuraag Vashishth on May 23, 2017 at 1:15pm

आ. राजेश कुमारी जी, हार्दिक शुभकामनाएं.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 20, 2017 at 11:01am

आद० अनुराग जी अच्छी ग़ज़ल कही है दिल से दाद हाजिर है |

Comment by Anuraag Vashishth on May 20, 2017 at 8:09am

आ. गुरप्रीत जी, हार्दिक धन्यवाद. 

Comment by Anuraag Vashishth on May 20, 2017 at 8:08am

आ. सुरेन्द्रनाथ जी, हार्दिक धन्यवाद.  

Comment by Gurpreet Singh on May 19, 2017 at 2:03pm

अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई और अच्छी जानकारी के लिए धन्यवाद आदरणीय अनुराग जी 

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on May 19, 2017 at 3:39am
आद0 अनुराग जी सादर अभिवादन, एक बेहतरीन ग़ज़ल पढ़ने को मिली, वाह क्या कहने,बहुत बहुत बधाई। सादर
Comment by Anuraag Vashishth on May 18, 2017 at 6:36pm

आ. लक्ष्मण जी, हार्दिक धन्यवाद.

Comment by Anuraag Vashishth on May 18, 2017 at 6:33pm

आ. नीलेश जी,

आपने को नया सीखने वाला कहना आपकी नम्रता है. वर्ना आपकी क्षमताओं से हम सब वाकिफ हैं. गलतियों को लेकर आपका दृष्टिकोण सही है ये मैं पहले भी कह चूका हूँ.  

'पहले तकाबुले-रादीफैन या ऐब-ए-तनाफुर को ठीक से जान लिया जाय तथा  सिर्फ़ और सिर्फ उसी सूरत में स्वीकार किया जाय जहाँ मिसरा कहने   की और कोई सूरत न बची हो ..'

इसमें मै सिर्फ इतना ही जोड़ना चाहूँगा कि जो भी नया मिसरा कहा जाय वो मूल से कमतर न हो. अगर बदलाब के बाद मिसारा कमजोर होता है और गलती बहुत अखरने वाली न हो तो मिसरा मूल रूप में रहने देना ही बेहतर होगा.  

सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 18, 2017 at 11:34am

आ. भाई अनुराग जी , एक बेहतरीन गजल से परिचित कराने हेतु हार्दिक बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 17, 2017 at 10:13pm

आ. अनुराग जी,
मुझ जैसे नये सीखने वालों के लिये यहइ बहुत महत्वपूर्ण है कि  पहले तकाबुले-रादीफैन या ऐब-ए-तनाफुर को ठीक से जान लिया जाय तथा  सिर्फ़ और सिर्फ उसी सूरत में स्वीकार किया जाय जहाँ मिसरा कहने   की और कोई सूरत न बची हो ...

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