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हमारे हौसले अब तक कहाँ जालिम ने देखे हैं - अनुराग

मुफ़ाईलुन  मुफ़ाईलुन  मुफ़ाईलुन  मुफ़ाईलुन

हमारे हौसले अब तक  कहाँ जालिम ने देखे हैं

चटानें  टूट जाती  हैं  जहाँ  हम  पाँव रखते हैं

 

हमी  ने फूल  महकाए हैं सहराओं  के सीने में

हमी  ने  बंजरों  के सूने  दिल  में  बीज बोये हैं

 

हमी सर मार  के  मरते  रहे  हैं अपने तेशे पर

हमी  ने  पर्वतों  को  काट  के  रस्ते  बनाये  हैं

 

हमी ने आँधियों की सरकशी के रूख को मोड़ा है

हमी ने  जिद्दी  तूफानों  के  जालिम पंख तोड़े हैं

 

हमी हर हाल में उनको यहाँ सच करके देखेंगे

हमी ने  ज़िन्दगी की  बेहतरी  के ख्वाब देखे हैं

"मौलिक/अप्रकाशित" 

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Comment by rajesh kumari on Saturday

आद० अनुराग जी अच्छी ग़ज़ल कही है दिल से दाद हाजिर है |

Comment by Anuraag Vashishth on Saturday

आ. गुरप्रीत जी, हार्दिक धन्यवाद. 

Comment by Anuraag Vashishth on Saturday

आ. सुरेन्द्रनाथ जी, हार्दिक धन्यवाद.  

Comment by Gurpreet Singh on Friday

अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई और अच्छी जानकारी के लिए धन्यवाद आदरणीय अनुराग जी 

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on Thursday
आद0 अनुराग जी सादर अभिवादन, एक बेहतरीन ग़ज़ल पढ़ने को मिली, वाह क्या कहने,बहुत बहुत बधाई। सादर
Comment by Anuraag Vashishth on Thursday

आ. लक्ष्मण जी, हार्दिक धन्यवाद.

Comment by Anuraag Vashishth on Thursday

आ. नीलेश जी,

आपने को नया सीखने वाला कहना आपकी नम्रता है. वर्ना आपकी क्षमताओं से हम सब वाकिफ हैं. गलतियों को लेकर आपका दृष्टिकोण सही है ये मैं पहले भी कह चूका हूँ.  

'पहले तकाबुले-रादीफैन या ऐब-ए-तनाफुर को ठीक से जान लिया जाय तथा  सिर्फ़ और सिर्फ उसी सूरत में स्वीकार किया जाय जहाँ मिसरा कहने   की और कोई सूरत न बची हो ..'

इसमें मै सिर्फ इतना ही जोड़ना चाहूँगा कि जो भी नया मिसरा कहा जाय वो मूल से कमतर न हो. अगर बदलाब के बाद मिसारा कमजोर होता है और गलती बहुत अखरने वाली न हो तो मिसरा मूल रूप में रहने देना ही बेहतर होगा.  

सादर 

Comment by laxman dhami on Thursday

आ. भाई अनुराग जी , एक बेहतरीन गजल से परिचित कराने हेतु हार्दिक बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on Wednesday

आ. अनुराग जी,
मुझ जैसे नये सीखने वालों के लिये यहइ बहुत महत्वपूर्ण है कि  पहले तकाबुले-रादीफैन या ऐब-ए-तनाफुर को ठीक से जान लिया जाय तथा  सिर्फ़ और सिर्फ उसी सूरत में स्वीकार किया जाय जहाँ मिसरा कहने   की और कोई सूरत न बची हो ...

Comment by Anuraag Vashishth on Wednesday

तनाफुर पर आलेख निम्नलिखित लिंक पर पोस्ट कर दिया गया है :

http://www.openbooksonline.com/group/kaksha/forum/topics/5170231:To...

कुछ छोटे परिवर्तनों के अलावा सब कुछ पूर्ववत हैं.

सिर्फ अंत में ये दो वाक्य और जोड़े गए हैं :

''शेर में कोई भी सुधार शेर को और बेहतर बनाने के लिए होता है. अगर गलती को ठीक करने के बाद शेर पहले से कमजोर हो रहा हो तो ऐसा कोई भी सुधार अपने आप में गलती है.''

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