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पिघलता मुखौटा - मोहित मुक्त

ऋतू परिवर्तन हो चूका है ,

धकेल ठंढ की रजाइयों को ,

लेकर लू की सौगात ,

ग्रीष्म अपने उफान की ओर,

कदम दर कदम बढ़ाते हुए ,

पिघला रहा है दुनिया का मुखौटा ,

डिग्री डिग्री पारा चढ़ाते हुए ,

जो बेबस थे कल तक अर्धनग्न ,

ठिठुरती ठंढी थपेड़ों से,

वो फिर बेबस है बेघर है ,

लू की गर्म चपेटों से ,

ओवरब्रिज के खम्भों की ओट में ,

गर्म आँधियो से बचने के लिए ,

मजबूर वो निस्तेज आँखों वाला बच्चा ,

क्या सोचता होगा जब ,

बगल से गुजरते कुछ हम उम्र कहते है,

कितनी अच्छी गर्मी है हम शिमला जाने वाले है.

उसे तो न ठंढ न ग्रीष्म न बरसात,

दो टुकड़े रोटी के सिवा कुछ मजा नहीं देता ,

काश मौसम परिवर्तन के साथ,

ह्रदय परिवर्तन भी होता |

-मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by Mohit mukt yesterday

रचना पढ़ने के लिए सहृदय धन्यवाद।  आपकी राय ध्यान रखूँगा आदरणीय  Mahendra Kumar जी 

Comment by Mahendra Kumar on Wednesday

बहुत बढ़िया कविता है आदरणीय मोहित जी. थोड़ी टंकण त्रुटियाँ हैं, उन्हें देख लीजिएगा. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Mohit mukt on May 15, 2017 at 8:30pm

शुक्रिया आदरणीय  सतविन्द्र कुमार जी

Comment by Mohit mukt on May 15, 2017 at 8:29pm

शुक्रिया आदरणीय Sheikh Shahzad Usmani जी 

Comment by सतविन्द्र कुमार on May 15, 2017 at 6:38pm
बहुत कुछ कहने की कोशिश,हारदिक बधाई आदरणीय
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 14, 2017 at 1:01pm
बेहतरीन चित्रण, बेहतरीन सृजन के लिए सादर हार्दिक बधाई आदरणीय मोहित मुक्त जी।

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