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पिघलता मुखौटा - मोहित मुक्त

ऋतू परिवर्तन हो चूका है ,

धकेल ठंढ की रजाइयों को ,

लेकर लू की सौगात ,

ग्रीष्म अपने उफान की ओर,

कदम दर कदम बढ़ाते हुए ,

पिघला रहा है दुनिया का मुखौटा ,

डिग्री डिग्री पारा चढ़ाते हुए ,

जो बेबस थे कल तक अर्धनग्न ,

ठिठुरती ठंढी थपेड़ों से,

वो फिर बेबस है बेघर है ,

लू की गर्म चपेटों से ,

ओवरब्रिज के खम्भों की ओट में ,

गर्म आँधियो से बचने के लिए ,

मजबूर वो निस्तेज आँखों वाला बच्चा ,

क्या सोचता होगा जब ,

बगल से गुजरते कुछ हम उम्र कहते है,

कितनी अच्छी गर्मी है हम शिमला जाने वाले है.

उसे तो न ठंढ न ग्रीष्म न बरसात,

दो टुकड़े रोटी के सिवा कुछ मजा नहीं देता ,

काश मौसम परिवर्तन के साथ,

ह्रदय परिवर्तन भी होता |

-मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by Mohit mishra (mukt) on May 21, 2017 at 10:08am

रचना पढ़ने के लिए सहृदय धन्यवाद।  आपकी राय ध्यान रखूँगा आदरणीय  Mahendra Kumar जी 

Comment by Mahendra Kumar on May 17, 2017 at 9:37am

बहुत बढ़िया कविता है आदरणीय मोहित जी. थोड़ी टंकण त्रुटियाँ हैं, उन्हें देख लीजिएगा. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Mohit mishra (mukt) on May 15, 2017 at 8:30pm

शुक्रिया आदरणीय  सतविन्द्र कुमार जी

Comment by Mohit mishra (mukt) on May 15, 2017 at 8:29pm

शुक्रिया आदरणीय Sheikh Shahzad Usmani जी 

Comment by सतविन्द्र कुमार on May 15, 2017 at 6:38pm
बहुत कुछ कहने की कोशिश,हारदिक बधाई आदरणीय
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 14, 2017 at 1:01pm
बेहतरीन चित्रण, बेहतरीन सृजन के लिए सादर हार्दिक बधाई आदरणीय मोहित मुक्त जी।

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