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इश्क़ से ना हो राब्ता कोई
ज़िन्दगी है की हादसा कोई

वो पुराने ज़माने की बात है
अब नहीं करता है वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने
मौत का है न फ़लसफ़ा कोई

यहाँ सब बे अदब हैं मेरी जां
अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का है टूटने का ग़म 'नाहक'
था सलामत मुआहिदा कोई

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by dandpani nahak on Thursday

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहब आदाब बहुत बहुत शुक्रिया आपका अपने क़ीमती वक़्त और 

सलाह से नवाज़ने के लिए ! 'दिल जो टूटा तो  ग़म नहीं नाहक, था सलामत महायदा कोई ' वाह आपने 

संवार दिया लेकिन जनाब क्या मैंने जिसे मुआहिदा लिखा है जिसके मानी करार ( contract ) है महायदा है 

यानी  क्या महायदा सहीह है कृपया मार्गदर्शन करें  सादर 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on Thursday

//दिल का है टूटने का ग़म 'नाहक'

    था सलामत मुआहिदा कोई//    इस शे'र को हटाने के बजाय यूँ कर सकते हैं :

दिल जो टूटा तो ग़म नहीं नाहक़ 

  था सलामत महायदा कोई         यहांँ नाहक़ आपका तख़ल्लुस से ज़्यादा बहुत अहम मानी रखता है। सादर। 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on Thursday

आदरणीय दण्डपाणि नाहक़ जी आदाब, देरी से प्रतिक्रिया देने की कुछ वजूहात रही होंगी मैं समझ सकता हूँ  it's OK.

//तीसरे शैर में जो राब्ता ज़िन्दगी मौत का आपस में है क्या वही राब्ता मरहले और फ़लसफ़ा में है//

जनाब आपके तीसरे शे'र में जो राब्ता जद्दोजहद और फ़लसफ़ा में है वही राब्ता मरहले और फ़लसफ़ा में है दरअस्ल मैं नहीं चाहता था कि आपके शे'र का भाव बदल जाए। 

"मरहले ज़िन्दगी में रहते हैं 

मौत का है न फ़लसफ़ा कोई"  इस शे'र का मफ़हूम वही है जो आपके शे'र का है। 

मरहला जिसका बहुवचन मरहले होता है का अर्थ है : विभिन्न परिस्थितियां, पड़ाव, मुश्किलात वग़ैरह। जबकि 

फ़लसफ़ा का अर्थ है : नज़रिया, तदबीर, अक़्लमंदी, हिकमत वग़ैरह। 

" ढूंढने से यहाँ खुदा मिलता                                                             ढूंढने से ख़ुदा भी मिलता है 

 मिल ही जाएगा रास्ता कोई"  बहतर है, चाहें तो ऊला यूँ कर सकते हैं :    मिल ही जाएगा रास्ता कोई

सादर। 

Comment by dandpani nahak on Thursday

आदरणीय नीलेश जी मैं बहुत शर्मिंदा हूँ और मुआफ़ी चाहता हूँ इस देरी के लिए 

आपका बहुत बहुत शुक्रिया आपने अपना कीमती समय निकाला आपकी सलाह सर माथे पर 

कृपा हमेशा बनाए रखें सादर 

Comment by dandpani nahak on Thursday

आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर ' जी नमस्ते  मुआफ़ी चाहता हूँ देरी से आने के लिए 

आपकी सलाह दुरुस्त है किन्तु मुझे बह्र बदलने से ज़ियादा आसान शैर बदलना लगा !कृपा बनाये रखें !

Comment by dandpani nahak on Thursday

आदरणीय रूपम kumar 'मीत ' जी नमस्ते मैं देरी से हाजिर होने के लिए मुआफ़ी चाहता हूँ 

आपने सहीह फ़रमाया 'न' ही उचित होगा ! बहुत बहुत धन्यवाद जनाब आपके सलाह की मुझे hamesha

आवश्यकता होगी !कृपा कीजिएगा !

Comment by dandpani nahak on Thursday

आदरणीय अमीरुद्दीन  'अमीर ' साहब आदाब बहुत मुआफ़ी चाहता हूँ इस देरी के लिए ! आदरणीय आपकी सलाह 

बहुत उम्दा है और इससे मेरी ग़ज़ल सही मायनो में  अब ग़ज़ल हुई है आदरणीय तीसरे शैर  में जो राब्ता ज़िन्दगी मौत का 

आपस में है क्या वही राब्ता मरहले और फ़लसफ़ा में है आपका मार्गदर्शन चाहूंगा जिस शैर का शिल्प कमज़ोर है उसे हटा देता हूँ 

उसके बदले एक नया शैर मुलाहिज़ा फरमाएं और अपना क़ीमती  सलाह देने की कृपा करें 

ढूंढने से यहाँ खुदा मिलता 

मिल ही जाएगा रास्ता कोई 

देरी के लिए एक बार फिर मुआफ़ी चाहता हूँ आदरणीय 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 30, 2020 at 2:10pm

जनाब रूपम कुमार जी आदाब, मैंने दण्डपाणि नाहक़ जी की ग़ज़ल पर टिप्पणी मात्र की है और अपने सुझाव पेश किए हैं, कोई किसी का एक मिसरा भी दुरुुस्त नहीं कर सकता जबतक कि स्वयं रचयिता किसी सुझाव को स्वीकार कर गृहण न कर ले। किसी की रचनाओं पर की गई टिप्पणी और सुझावों पर प्रतिक्रिया देने का पहला अधिकार उस रचयिता का ही होता है, इसलिए थोड़ा धैर्य रखिए, धीरे-धीरे सब सीख जाएंगे, अभी तो पहले सण्डे वाला टास्क पूरा कीजिए। सादर। 

Comment by Rupam kumar -'मीत' on September 30, 2020 at 7:40am

आदरणीय, अमीरुद्दीन साहिब, प्रणाम ।

आपने शे'र काफी दुरुस्त कर दिए,
हमने भी यह ग़ज़ल पढ़ी लेकिन इतनी नज़र अच्छी नहीं कि इस मेयार तक देख पाते,

आपके एक सवाल है,

"शे'र का शिल्प कमज़ोर है" इस का मतलब क्या हुआ और शिल्प को दुरुस्त कैसे किया जाता है,

मुझे पता नहीं इस मंच पर सवाल जवाब कहाँ किया जाता है, यह कमेंट पढ़ा तो हमने यहीं पूछ लिया ग़लती हुई हो तो मुआ'फ़ी चाहूंगा,

हमने आपको एक मैसेज भी किया था, लेकिन पता नहीं आपको वो मिला नहीं कि आपने वो देखा नहीं अभी तक, हम मुंतज़िर थे आपके जवाब का, सादर।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 29, 2020 at 10:46pm

आदरणीय दण्डपाणि नाहक़ जी आदाब ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बहुत ख़ूबसूरत इन्सानी जज़्बात आपने अपनी ग़ज़ल में पिरोए हैं बधाई स्वीकार करें, कुछ सुझाव पेश करने की जसारत कर रहा हूंँ :

इश्क़ से ना हो राब्ता कोई          इश्क़ से है न राब्ता कोई 

ज़िन्दगी है की हादसा कोई        ज़िन्दगी है कि हादिसा कोई   

वो पुराने ज़माने की बात है        बात वो है गये ज़माने की 

(ये मिसरा बह्र में नहीं है)          अब नहीं करता है वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने      मरहले ज़िन्दगी में रहते हैं 

(ये मिसरा बह्र में नहीं है)          मौत का है न फ़लसफ़ा कोई 

यहाँ सब बे अदब हैं मेरी जां      बेअदब हैं सभी तो याँ 'नाहक़' 

(ये मिसरा बह्र में नहीं है)          अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का है टूटने काग़म 'नाहक' दिल जो टूटा तो ग़म नहीं मुझको 

था सलामत मुआहिदा कोई       टूटा थोड़ी महायदा कोई

(इस शे'र का शिल्प कमज़ोर है)  सादर। 

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