For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

इश्क़ से ना हो राब्ता कोई
ज़िन्दगी है की हादसा कोई

वो पुराने ज़माने की बात है
अब नहीं करता है वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने
मौत का है न फ़लसफ़ा कोई

यहाँ सब बे अदब हैं मेरी जां
अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का है टूटने का ग़म 'नाहक'
था सलामत मुआहिदा कोई

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 284

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by dandpani nahak on October 28, 2020 at 11:29pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर ' साहब आदाब आपका बहुत बहुत शुक्रिया आपने 'मुआहिदा ' से संबंधित 

जमकारी दी ! 'था सलामत मुआहिदा कोई ' सहीह है लेकिन उला मिसरे में 'दिल का है टूटने का ग़म नाहक ' 

एक तरफ जहाँ तखल्लुस भी है वहीं नाहक के अर्थ में भी है यह कहने की कोशिश है कि 

दिल के टूटने का ग़म बेकार है क्योंकि कोई भी क़रार सलामत नहीं था हाँ काल  कि दृष्टि से 

'दिल का था टूटने का ग़म नाहक  ' किया जा सकता है लेकिन 'दिल जो टूटा तो ग़म नहीं नाहक'

में सिर्फ तखल्लुस का गुमान हो रहा है जबकि उसे दोनों अर्थों में लिया जाना ज़ियादा उचित होगा ऐसा मुझे लगता है 

अगर आपकी इज़ाज़त हो तो इस शैर को इस तरह कहना चाहूंगा 

'दिल का था टूटने का ग़म नाहक 

था सलामत मुआहिदा कोई '      कृपया अपना मार्गदर्शन दें सादर 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 26, 2020 at 1:49pm

जनाब दण्डपाणि 'नाहक़' जी महायदा आम बोलचाल में इस्तेमाल होता है लेकिन सहीह उच्चारण वही है जो आपने लिखा है - मुआहिदा। सादर। 

Comment by dandpani nahak on October 22, 2020 at 11:57pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहब आदाब बहुत बहुत शुक्रिया आपका अपने क़ीमती वक़्त और 

सलाह से नवाज़ने के लिए ! 'दिल जो टूटा तो  ग़म नहीं नाहक, था सलामत महायदा कोई ' वाह आपने 

संवार दिया लेकिन जनाब क्या मैंने जिसे मुआहिदा लिखा है जिसके मानी करार ( contract ) है महायदा है 

यानी  क्या महायदा सहीह है कृपया मार्गदर्शन करें  सादर 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 22, 2020 at 11:04pm

//दिल का है टूटने का ग़म 'नाहक'

    था सलामत मुआहिदा कोई//    इस शे'र को हटाने के बजाय यूँ कर सकते हैं :

दिल जो टूटा तो ग़म नहीं नाहक़ 

  था सलामत महायदा कोई         यहांँ नाहक़ आपका तख़ल्लुस से ज़्यादा बहुत अहम मानी रखता है। सादर। 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 22, 2020 at 10:43pm

आदरणीय दण्डपाणि नाहक़ जी आदाब, देरी से प्रतिक्रिया देने की कुछ वजूहात रही होंगी मैं समझ सकता हूँ  it's OK.

//तीसरे शैर में जो राब्ता ज़िन्दगी मौत का आपस में है क्या वही राब्ता मरहले और फ़लसफ़ा में है//

जनाब आपके तीसरे शे'र में जो राब्ता जद्दोजहद और फ़लसफ़ा में है वही राब्ता मरहले और फ़लसफ़ा में है दरअस्ल मैं नहीं चाहता था कि आपके शे'र का भाव बदल जाए। 

"मरहले ज़िन्दगी में रहते हैं 

मौत का है न फ़लसफ़ा कोई"  इस शे'र का मफ़हूम वही है जो आपके शे'र का है। 

मरहला जिसका बहुवचन मरहले होता है का अर्थ है : विभिन्न परिस्थितियां, पड़ाव, मुश्किलात वग़ैरह। जबकि 

फ़लसफ़ा का अर्थ है : नज़रिया, तदबीर, अक़्लमंदी, हिकमत वग़ैरह। 

" ढूंढने से यहाँ खुदा मिलता                                                             ढूंढने से ख़ुदा भी मिलता है 

 मिल ही जाएगा रास्ता कोई"  बहतर है, चाहें तो ऊला यूँ कर सकते हैं :    मिल ही जाएगा रास्ता कोई

सादर। 

Comment by dandpani nahak on October 22, 2020 at 9:42pm

आदरणीय नीलेश जी मैं बहुत शर्मिंदा हूँ और मुआफ़ी चाहता हूँ इस देरी के लिए 

आपका बहुत बहुत शुक्रिया आपने अपना कीमती समय निकाला आपकी सलाह सर माथे पर 

कृपा हमेशा बनाए रखें सादर 

Comment by dandpani nahak on October 22, 2020 at 9:38pm

आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर ' जी नमस्ते  मुआफ़ी चाहता हूँ देरी से आने के लिए 

आपकी सलाह दुरुस्त है किन्तु मुझे बह्र बदलने से ज़ियादा आसान शैर बदलना लगा !कृपा बनाये रखें !

Comment by dandpani nahak on October 22, 2020 at 9:06pm

आदरणीय रूपम kumar 'मीत ' जी नमस्ते मैं देरी से हाजिर होने के लिए मुआफ़ी चाहता हूँ 

आपने सहीह फ़रमाया 'न' ही उचित होगा ! बहुत बहुत धन्यवाद जनाब आपके सलाह की मुझे hamesha

आवश्यकता होगी !कृपा कीजिएगा !

Comment by dandpani nahak on October 22, 2020 at 9:02pm

आदरणीय अमीरुद्दीन  'अमीर ' साहब आदाब बहुत मुआफ़ी चाहता हूँ इस देरी के लिए ! आदरणीय आपकी सलाह 

बहुत उम्दा है और इससे मेरी ग़ज़ल सही मायनो में  अब ग़ज़ल हुई है आदरणीय तीसरे शैर  में जो राब्ता ज़िन्दगी मौत का 

आपस में है क्या वही राब्ता मरहले और फ़लसफ़ा में है आपका मार्गदर्शन चाहूंगा जिस शैर का शिल्प कमज़ोर है उसे हटा देता हूँ 

उसके बदले एक नया शैर मुलाहिज़ा फरमाएं और अपना क़ीमती  सलाह देने की कृपा करें 

ढूंढने से यहाँ खुदा मिलता 

मिल ही जाएगा रास्ता कोई 

देरी के लिए एक बार फिर मुआफ़ी चाहता हूँ आदरणीय 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 30, 2020 at 2:10pm

जनाब रूपम कुमार जी आदाब, मैंने दण्डपाणि नाहक़ जी की ग़ज़ल पर टिप्पणी मात्र की है और अपने सुझाव पेश किए हैं, कोई किसी का एक मिसरा भी दुरुुस्त नहीं कर सकता जबतक कि स्वयं रचयिता किसी सुझाव को स्वीकार कर गृहण न कर ले। किसी की रचनाओं पर की गई टिप्पणी और सुझावों पर प्रतिक्रिया देने का पहला अधिकार उस रचयिता का ही होता है, इसलिए थोड़ा धैर्य रखिए, धीरे-धीरे सब सीख जाएंगे, अभी तो पहले सण्डे वाला टास्क पूरा कीजिए। सादर। 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Richa Yadav commented on Samar kabeer's blog post "ओ बी ओ" की ग्यारहवीं सालगिरह का तुहफ़ा
"आदरणीय कबीर sirji, नमस्कार ओबीओ की ग्यारहवीं सालगिरह का खूबसूरत ग़ज़ल के रूप में ये तोहफ़ा…"
4 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post तेरे गम के निशानों को यहाँ पर कौन समझे
"आ. भाई सतविंद्र जी , सादर अभिवादन । उत्तम गजल हुई है हार्दिक बधाई ।"
12 hours ago
सतविन्द्र कुमार राणा commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post तेरे गम के निशानों को यहाँ पर कौन समझे
"जी, आदरणीय बृजेश भाई ऐसे किया जा सकताहै।सादर आभार"
12 hours ago
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
20 hours ago
Admin posted discussions
20 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post गर तबीयत जाननी है देश की -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई ब्रिजेश जी, गजल की सराहना के लिए धन्यवाद।"
21 hours ago
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: माँ
"सहृदय शुक्रिया आदरणीय ब्रज जी हौसला अफ़ज़ाई के लिये सादर इसके मापनी हैं 2212 2212 2222 2"
22 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-मेरी  उदासी  मुझे अकेला  न छोड़  देना
"सादर आभार आदरणीय धामी जी..."
22 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल: माँ
"बड़े ही प्यारे भाव हैं भाई तमाम जी...इसकी मापनी क्या है?"
22 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post तेरे गम के निशानों को यहाँ पर कौन समझे
"तब ठीक है लेकिन सौदा की जगह साधन भी किया जा सकता है...सादर "बनी व्यापार का साधन""
22 hours ago
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post नज़्म: मटर
"शुक्रिया आदरणीय धामी सर सहृदय धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई के लिये सादर"
22 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post गर तबीयत जाननी है देश की -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"बढ़िया ग़ज़ल के लिए बधाई आदरणीय..."
22 hours ago

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service