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जब क़सम हिंदुस्तान की है

जब क़सम हिंदुस्तान की है
फिक्र फिर किसे जान की है

फ़लक है समूचा तिरंगा
यही बात तो शान की है

ज़माने हुए थी सचाई
तस्वीरें ही पहचान की है

मुद्दतों से तो हम न सुधरे
घडी आज इम्तहान की है

शिखर पर मुल्क हो हमारा
ये ख्वाहिश ही नादान की है

दण्डपाणि नाहक

मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on August 16, 2018 at 10:55pm

जनाब दण्डपाणि नाहक़ जी आदाब, अच्छी कविता है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on August 16, 2018 at 1:37pm
दंडपाणि नाहक जी सादर अभिवादन। यह ग़ज़लनुमा कविता की शिल्प बता सकते हैं क्या?? क्योकि मुझे इसका शिल्प समझ मे नहीं आया। भाव के लिए बधाई देता हूँ। सादर

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