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नाभी में लेकर कस्तूरी  तय करता मृग कितनी दूरी (गीत राज )

नाभी में लेकर कस्तूरी 
तय करता मृग कितनी दूरी 

पागल मनवा उलझा उलझा 
सहरा-सहरा जंगल-जंगल 
खोज रहा है नादानी में
बौराया सा हर पल प्रति पल 
नाभी में लेकर कस्तूरी 
तय करता मृग कितनी दूरी 

रब के दर्शन की चाहत में 
मंदिर मस्जि़द रस्ते रस्ते 
भान नहीं है उनको इतना 
राम रहीमा उर में बसते 
बाहर ढूंढें चंदन नूरी 
कैसे होगी चाहत पूरी 

खेतों में जब उगता सूरज 
मिलता सबसे वो हँस हँस कर 
उजली भोर संदेशा लाती 
माटी बैठे तब सज धज कर 
मांग भरें किरणें सिंदूरी 
दिन भर करती फ़िर मजदूरी 

सहरा में पानी है दिखता
बादल में रोटी दिखती है 
उसके माथे की रेखा में 
किस्मत भी क्या क्या लिखती है 
ख्वाब अधूरे प्यास अधूरी
देखो गुर्बत की मजबूरी

नाभी में लेकर कस्तूरी 
तय करता मृग कितनी दूरी 
राजेश कुमारी राज

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Comment by rajesh kumari on September 24, 2018 at 5:59pm

आद० तेजवीर सिंह जी आपको गीत पसंद आया बहुत बहुत आभारी हूँ 

Comment by Samar kabeer on September 24, 2018 at 12:12pm

बहना राजेश कुमारी जी आदाब,बहुत सुंदर गीत लिखा आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

मुझे ऐसा लग रहा है कि आपने ये गीत पहले भी ब्लॉग पर पोस्ट किया है?

एक ज़रूरी बात ये कि आपने  रचना के साथ मंच के नियमानुसार मौलिक व अप्रकाशित नहीं लिखा?

Comment by Ajay Kumar Sharma on September 24, 2018 at 6:53am

बहुत सुन्दर रचना.

बधाई स्वीकार करें

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 24, 2018 at 4:30am

आ. राजेश दी, सादर अभिवादन । सुंदर गीत हुआ है । हार्दिक बधाई ।

Comment by narendrasinh chauhan on September 22, 2018 at 2:04pm

बहोत सुन्दर रचना 

Comment by TEJ VEER SINGH on September 22, 2018 at 12:24pm

हार्दिक बधाई आदरणीय राजेश कुमारी जी।बेहतरीन गीत।

सहरा में पानी है दिखता
बादल में रोटी दिखती है 
उसके माथे की रेखा में 
किस्मत भी क्या क्या लिखती है 
ख्वाब अधूरे प्यास अधूरी
देखो गुर्बत की मजबूरी

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