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परिणाम....


मेरी पलक का स्वप्न
तुमसे नेह का
परिणाम था

मेरी कमीज पर
लगा दाग
तृषा और तृप्ति की
जंग का
परिणाम था

मेरे अधरों पर
छूटा हुआ
असहाय सा स्पर्श
हिय कंदराओं में पलते
भावों का
परिणाम था

ओस की बूँद में
परिलिक्षित होता
सुंदरता का सागर
तुमसे असीम स्नेह का
परिणाम था

क्यूँ तुमने ऐसा किया
अपनी रातों में
मेरी रातों को समाहित कर
मुझसे मुझको छीन लिया
मैंने
तुम्हें पाने के लिए
अपने सभी प्रतिबन्ध जला दिए
और तुम
मेरी प्रीत के
स्नेहिल अनुबंधों की
प्रतिध्वनि बन
दूर तक
मेरे भीतर
गूंजती रही
शायद
ये मेरी प्रतीक्षा की
अनबोली अभिव्यक्ति का
शाश्वत
परिणाम था

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on September 21, 2018 at 1:50pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 19, 2018 at 1:01pm

आ. भाई सुशील जी, सुंदर रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Sushil Sarna on September 17, 2018 at 3:54pm

आदरणीय Samar kabeer जी सृजन को मान देने का दिल से आभार

Comment by Samar kabeer on September 16, 2018 at 7:22pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत अच्छी कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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