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जीवन के दोहे :


बड़ा निराला मेल है, श्वास देह का संग।
जैसे चन्दन से लिपट, जीवित रहे भुजंग।1।

अजब जहाँ की रीत है, अज़ब यहाँ की प्रीत।
कब नैनों की रार से, उपजे जीवन गीत ।2।

बड़ा अनोखा ईश का, है आदम उत्पाद।
खुद को कहता है खुदा, वो आने के बाद।3।

झूठे रांझे अब यहां, झूठी उनकी हीर।
झूठा नैनन नीर है, झूठी उनकी पीर।4।

जैसे ही माँ ने रखा, बेटे के सर हाथ।
बह निकली फिर पीर की, गंगा जमुना साथ।5।

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on August 24, 2018 at 3:34pm

आदरणीय डॉ छोटेलाल सिंह जी सृजन को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by babitagupta on August 23, 2018 at 6:36pm

बेहतरीन रचना , जीवन को इंगित करते।बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी। 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 22, 2018 at 12:04pm

पहला ही दोहा दर्शन के हृदय क्षेत्र को छू रहा......

तीसरा दोहा.....बहुत मारक और वाज़िब है.....

पाँचवा दोहा तो मेरी व्यक्तिगत अनुभूति का प्रस्तुतिकरण है.....आपको इस उत्तम दोहावली के लिए बहुत सारी बधाई

Comment by narendrasinh chauhan on August 22, 2018 at 10:39am
लाजवाब दोहे
Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on August 21, 2018 at 9:07pm

आदरणीय सुशील सरना जी बहुत ही सुंदर दोहे बधाई हो 

Comment by Sushil Sarna on August 21, 2018 at 5:10pm

आदरणीय समर कबीर साहिब , आदाब .... सृजन के भावों को आत्मीय स्नेह से अलंकृत करने का दिल से आभार। मात्रा दोष को इंगित करने के लिए आपका हार्दिक आभार। मैं इसे अभी संशोधित करता हूँ। आपका हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on August 21, 2018 at 5:10pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को आत्मीय स्नेह देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on August 21, 2018 at 5:09pm

आदरणीय अशोक रक्ताले जी , सादर प्रणाम ... सृजन पर आपकी समीक्षात्मक आत्मीय प्रशंसा का दिल से शुक्रिया। तृतीय दोहे के मात्रिक दोष में मैं अभी संशोधन करता हूँ। त्रुटि की और ध्यान आकर्षित करने का दिल से आभार। आपका सुझाव अमूल्य है। हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on August 21, 2018 at 5:09pm

आदरणीया कल्पना भट्ट जी सृजन आपकी मधुर प्रशंसा का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on August 21, 2018 at 5:09pm

आदरणीय बसंत कुमार जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

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