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जीवन के दोहे :


बड़ा निराला मेल है, श्वास देह का संग।
जैसे चन्दन से लिपट, जीवित रहे भुजंग।1।

अजब जहाँ की रीत है, अज़ब यहाँ की प्रीत।
कब नैनों की रार से, उपजे जीवन गीत ।2।

बड़ा अनोखा ईश का, है आदम उत्पाद।
खुद को कहता है खुदा, वो आने के बाद।3।

झूठे रांझे अब यहां, झूठी उनकी हीर।
झूठा नैनन नीर है, झूठी उनकी पीर।4।

जैसे ही माँ ने रखा, बेटे के सर हाथ।
बह निकली फिर पीर की, गंगा जमुना साथ।5।

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 21, 2018 at 6:38am

आ. भाई सुशील जी, जीवन से सम्बद्ध सुंदर दोहे हुये हैं ।हार्दिक बधाई ।

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 20, 2018 at 9:36pm

आदरणीय सुशील सरना साहब सादर नमस्कार, बहुत सुंदर दोहे रचे हैं आपने. श्वांस देह का संग तो चंदन भुजंग से भी प्रबल है. तृतीय दोहे के द्वितीय चरण की मात्राएँ देख लें. चौथे दोहे में संसार में बढ़ते झूठ की ओर बहुत उत्तम इशारा है आपका. वहीँ अंतिम दोहे में सच्चे प्रेम से सच्चे स्नेह से कितना संबल मिलता है यह दर्शाया है. हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर.  

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 20, 2018 at 8:17pm

बहुत सुंदर दोहे , हार्दिक बधाई आपको आदरणीय |

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 20, 2018 at 7:54pm

वाह बहुत सुंदर दोहे , बधाई आपको 

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