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आग जला कर जग-जगती की  
धूनी तज कर
साँसें लेलें ! 
खप्पर का तो सुख नश्वर है 
चलो मसानी, रोटी बेलें !!
 
जगत प्रबल है दायित्वों का 
और सबलतम 
इसकी माया 
अँधियारे का प्रेम उपट कर 
तम से पाटे 
किया-कराया 
 
उलझन में चल
काया जोतें 
माया का भरमाया झेलें ! 
 
जस खाते,
तस जीते हैं सब 
खाते-जीते 
पीते भी हैं 
और भभकते औंधेमुँह के
बखत उपासे बीते भी हैं 
 
इन कंधों पर बरतन-बहँगी 
लेकर आओ 
जग में हेलें ! 
 
इस मिट्टी ने जीव जगाया 
और सजायी
मिलजुल दुनिया 
बहुत अभागे अलग कातते  
खुद की तकली, 
खुद की पुनिया 
 
कहो निभे क्यों आपसदारी ?
अगर दिखा कुछ..  
चाहा लेलें ! 
***
सौरभ
 
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Saurabh Pandey on August 28, 2018 at 9:46pm

आदरणीय हरिहर झा जी, आप द्वारा मिली अनुशंसा भावमय कर रही है. वस्तुतः, प्रस्तुत नवगीत के कथ्य के इंगितों पर आप जैसे सुधी पाठक से तथ्यपरक सुनने की उत्कंठा बलवती हो उठी है. 

अनुमोदन के लिए हार्दिक धन्यवाद

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on August 22, 2018 at 7:24pm

आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सादर अभिवादन नवगीत पढ़कर हमें आनन्द की अनुभूति हुई आपको दिल से बधाई 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 22, 2018 at 12:22pm

आपकी भाषा, शैली, कथ्य और उनको जीवंत रूप दे देने की असीम क्षमता, कोई जान बूझ कर उपेक्षित कर दे तो अलग बात है लेकिन उसकी रचनाधर्मिता ऐसे ही प्रयास के लिए लोभ से युक्त हो ही जाती होगी, कदाचित चल रहे समय में कोई दूसरा तो नहीं दिखता, हिंदी-भाषा मे ऐसे चित्र गढ़ने वाला साहित्यकार। आपको सादर प्रणाम

एक छोटा सा दोष है, रचना में; सम्भवतः यह दोष मेरी क्षुद्र-बुद्धि का भ्रम हो?

उलझन में
चल काया जोतें 
माया का भरमाया झेलें ! 
चलो मसानी, रोटी बेलें.....
चल और चलो?????
 

Comment by Neelam Upadhyaya on August 20, 2018 at 3:56pm

आदरणीय सौरभ पाण्डे जी, नमस्कार ।   बहुत ही सूंदर गीत की रचना।  प्रस्तुति पर  हार्दिक बधाई स्वीकार करें  ।

Comment by Samar kabeer on August 20, 2018 at 2:35pm

जनाब सौरभ पाण्डेय साहिब आदाब, बहुत समय बाद आपका नवगीत पढ़ने का मौक़ा मिला है,हमेशा की तरह भाषा का उत्तम प्रयोग देखने को मिला,गीत का प्रवाह भी दर्शनीय है,बहुत ख़ूब वाह, इस उम्दा प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें।

और हाँ, मंच के नियमानुसार आपने मौलिक व अप्रकाशित नहीं लिखा?

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 20, 2018 at 12:59pm

अदभुत गीत का सृजन हुआ है आदरणीय, आनंद आ गया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 20, 2018 at 6:43am

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन । उत्तम गीत के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by Ajay Tiwari on August 19, 2018 at 9:22am

आदरणीय सौरभ जी,

शब्दों के प्रयोग में अधिकतम कंजूसी और गीत के आधार के तौर पर चौपाई का खुबसूरत इस्तेमाल बहुत अच्छा लगा.

'इन कंधों पर बरतन-बहँगी 
लेकर आओ 
जग में हेलें !'
ये पंक्तियां कोई ऐसा कवि ही लिख सकता है जिसकी भाषाई जड़े बहुत गहरी हों और जिसका ज़िन्दगी से ज़मीनी रिश्ता हो.
एक और प्रभावी गीत-प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई.
सादर   

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