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गजल- कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं

कब यहाँ पर प्यार की बातें हुईं

जब हुईं तकरार की बातें हुईं

 

दो मिनट कचनार की बातें हुईं

फिर अधिकतर खार की बातें हुईं

 

बाढ़ में जब बह चुका सब, तब कहीं

नाव की, पतवार की बातें हुईं

 

जून सा था वोट का सीजन, मगर  

श्रावणी बौछार की बातें हुईं

अल्पमत में आ गई सरकार जब,

चोर थानेदार की बातें हुईं

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 16, 2018 at 6:48am

आ. भाई बसंत जी, उम्दा गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 14, 2018 at 4:05pm

आदरणीया Neelam Upadhyaya जी हृदय से आभार आपका 

Comment by Neelam Upadhyaya on August 14, 2018 at 3:19pm

आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी,  नमस्कार । अच्छी रचना की प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 13, 2018 at 12:30pm

आदरणीय Gurpreet Singh जी आपकी इस्लाह का हृदय से आभार, आपका सुझाव उचित लगा मुझे भी , ठीक करता हूँ 

Comment by Gurpreet Singh on August 12, 2018 at 5:50pm

आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी ,  बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल हुई है । बहुत बहुत बधाई आपको ।  दूसरा शेर और ये वाला  शेर बहुत पसंद आए 

बाढ़ में जब बह चुका सब, तब कहीं

नाव की, पतवार की बातें हुईं

वैसे मुझे लगा कि ऊला में अगर ' चुका'  की  जगह ' गया'  शायद ज़्यादा ठीक रहता  

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 11, 2018 at 9:33pm

ह्रदय से आभार आदरणीय समर कबीर जी एवं रवि शुक्ला  जी आपका , सादर नमन 

Comment by Ravi Shukla on August 10, 2018 at 8:27pm

आदरणीय बसंत जी बहुत बहुत बधाई इस गजल के  लिए 

Comment by Samar kabeer on August 10, 2018 at 6:13pm

अब ठीक है ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 10, 2018 at 5:40pm

आदरणीय समर कबीर जी, आपके इस्लाह को सादर नमन, अभी देखें शायद  दोष दूर हुआ 

Comment by Samar kabeer on August 10, 2018 at 2:03pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

"जून सा था वोट का मौसम"

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखें "मौसम मगर" ।

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