For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल ( दूर माशूक़ से आशिक़ कहाँ जाना चाहे )

(फाइलातुन -फइलातुन- फइलातुन-फेलुन )

दूर माशूक़ से आशिक़ कहाँ जाना चाहे |
कूचये यार में वो अपना ठिकाना चाहे |

मैं ही आया हूँ नहीं सिर्फ़ परखने क़िस्मत
उन को तो अपना हर इक शख्स बनाना चाहे |

थाम के हाथ जो देता हो हमेशा धोका
कौन उस शख्स से फिर हाथ मिलाना चाहे |

फितरते शमअ जलाना है तअज्जुब है मगर
जान परवाना वहाँ फिर भी लुटाना चाहे |

मुफ़लिसी के हैं यह मारे हुए ज़ालिम वरना
तेरी दहलीज़ पे सर कौन झुकाना चाहे |

दरमियाँ अपने रहे दोस्ती यूँ ही क़ायम
मेरे महबूब भला कब यह ज़माना चाहे |

हर नज़र मुझ पे ही तस्दीक़ लगी है वरना
उनके चहरे से नज़र कौन हटाना चाहे |

(मौलिक व अप्रकाशित )

Views: 84

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on Wednesday

जनाब राम अवध साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on Wednesday

जनाब नीरज साहिब ,ग़ज़ल को पसंद करने और आपकी हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on Wednesday

हर शेर खूबसूरत क्या खूब ग़ज़ल है।

मुबारकबाद कुबूल फरमायें।

Comment by Neeraj Mishra "प्रेम" on February 14, 2018 at 11:00am

ओह्ह क्या बात है आदरणीय tasdiq भाई आखिरी शेर ने बहुत ही कातिल है कितनी दाद दूँ समझ नही आता ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 14, 2018 at 10:22am

मुहतरम जनाब विजय साहिब ,आपकी खूबसूरत प्रतिक्रिया ,और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 14, 2018 at 10:21am

जनाब सलीम रज़ा साहिब ,ग़ज़ल में आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया ,शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 14, 2018 at 10:19am

जनाब लक्ष्मण धामी साहिब ,आपकी ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by vijay nikore on February 14, 2018 at 9:55am

 //मुफ़लिसी के हैं यह मारे हुए ज़ालिम वरना 
तेरी दहलीज़ पे सर कौन झुकाना चाहे |//

भाई तस्दीक अहमद जी, गज़ल बार-बार पढ़ी... दिल से बधाई। 

Comment by SALIM RAZA REWA on February 14, 2018 at 12:07am

मैं ही आया हूँ नहीं सिर्फ़ परखने क़िस्मत
उन को तो अपना हर इक शख्स बनाना चाहे |.... वाह 

Comment by SALIM RAZA REWA on February 14, 2018 at 12:06am

वाह वाह मुरस्सा ग़ज़ल...  हुई है जनाब तस्दीक साहब  वाह वाह क्या कहने हर शेर के लिए मुबारक़बाद.. 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव posted a discussion

सीता-चरित्र के नए प्रतिमान गढ़ता हुआ उपन्यास ‘सीता सोंचती थीं’-   डॉ० गोपाल नारायण श्रीवास्तव

       राम भगवान थे या सामान्य मानव, अवतार थे या इतिहासपुरुष, काल्पनिक चरित्र थे या सचमुच कोई…See More
8 minutes ago
Rakshita Singh posted a blog post

तुम्हारे इश्क ने मुझको क्या क्या बना दिया ...

तुम्हारे इश्क ने मुझको, क्या क्या बना दिया... कभी आशिक,कभी पागल- कभी शायर बना दिया।।अब इतने नाम हैं…See More
9 minutes ago
Mohammed Arif posted a blog post

कविता--फागुन

फागुनअलसाई हुई भोर कोफागुनी दस्तक कीगंध ने महका दियामेरे अंदर भी बीज अंकुरित होने लगेतुम्हारे…See More
9 minutes ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' posted a blog post

ग़ज़ल...न जाने कैसे गुजरेगी क़यामत रात भारी है-बृजेश कुमार 'ब्रज'

1222 1222 1222 1222 अभी ये आँख बोझिल है निहाँ कुछ बेक़रारी है न जाने कैसे गुजरेगी क़यामत रात भारी…See More
9 minutes ago
KALPANA BHATT ('रौनक़') posted a blog post

एक और रत्नाकर(लघुकथा)

रत्नाकर जंगलों में भटकता, और आने-जाने वालों को लूटता | यही तो उसका पेशा था| नारद-मुनी भेस बदलकर…See More
9 minutes ago
Mohammed Arif is now friends with Ramavtar Yadav, Sahar Nasirabadi, vijay nikore, Sushil Sarna and 5 more
48 minutes ago
पीयूष कुमार द्विवेदी is now a member of Open Books Online
3 hours ago
Rakshita Singh commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दबे  पाप  ऊपर  जो  आने  लगे  हैं- गजल
"आदरणीय लक्ष्मण जी, नमस्कार। बहुत ही सुन्दर रचना, हार्दिक बधाई स्वीकार करें।"
7 hours ago
Rakshita Singh commented on Rakshita Singh's blog post तुम्हारे इश्क ने मुझको क्या क्या बना दिया ...
"आदरणीय नादिर जी, बहुत बहुत आभार। आपके द्वारा बताई त्रुटी को मैं शीघ्र ही सुधार लेती हूँ।"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post धरती पुत्र (लघुकथा)
"बेहतरीन विषय और कथा.."
14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Anita Maurya's blog post बोल देती है बेज़ुबानी भी
"बहुत खूब"
14 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल...न जाने कैसे गुजरेगी क़यामत रात भारी है-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"शुक्रिया आदरणीय श्याम नारायण जी...सादर"
17 hours ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service