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हमने हरिक उम्मीद का पुतला जला दिया- सलीम रज़ा

221 2121 1221 212
हमने हरिक उम्मीद का पुतला जला दिया
दुश्वारियों को पांव के नीचे दबा दिया
-
मेरी तमाम उँगलियाँ घायल तो हो गईं
लेकिन तुम्हारी याद का नक्शा मिटा दिया  
-
मैंने तमाम छाँव ग़रीबों में बांट दी
और ये किया कि धूप को पागल बना दिया
-
उसके हँसीं लिबास पे इक दाग़ क्या लगा 
सारा  ग़ुरूर ख़ाक़ में उसका मिला दिया 
-
जो  ज़ख्म  खाके भी रहा है आपका सदा 
उस दिल पे फिर से आपने खंज़र चला दिया
-
उसने निभाई ख़ूब मेरी दोस्ती " रज़ा "
इल्ज़ाम-ए-क़त्ल-ए-यार मुझी पर लगा दिया
_______________________________
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on January 23, 2018 at 12:02pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सलीम रज़ा रेवा साहब जी।बेहतरीन गज़ल।

जो  ज़ख्म  खाके भी रहा है आपका सदा 
उस दिल पे फिर से आपने खंज़र चला दिया

Comment by SALIM RAZA REWA on January 23, 2018 at 8:59am
सतविन्द्र कुमार जी
ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया,
Comment by सतविन्द्र कुमार on January 22, 2018 at 11:17pm
वाहः वाहः बहुत खूब अशआर हुए हैं। सादर बधाई
Comment by SALIM RAZA REWA on January 22, 2018 at 11:12pm
शुक्रिया मोहित भाई.
Comment by Mohit mishra (mukt) on January 22, 2018 at 10:40pm

आदरणीय सलीम जी उम्दा ग़ज़ल, बहुत बहुत मुबारकबाद 

Comment by SALIM RAZA REWA on January 22, 2018 at 1:47pm
जी हाँ जनाब, बहुत बहुत शुक्रिया ग़ज़ल पे आपकी इनायत के लिए..
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on January 22, 2018 at 12:02pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब , उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें। 

आखरी शेर में क़ाफ़िया लगा  की जगह लाग  टाइप हो गया है ,देखियेगा

Comment by SALIM RAZA REWA on January 22, 2018 at 11:03am
बृजेश भाई. बहुत बहुत शुक्रिया.
Comment by SALIM RAZA REWA on January 22, 2018 at 11:02am
आ. बसंत कुमार जी,
आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 20, 2018 at 3:13pm

क्या कहने आदरणीय सलीम साहेब..बहुत ही शानदार ग़ज़ल हुई..सादर

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