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तू अगर बा - वफ़ा नहीं होता - सलीम रज़ा रीवा

 2122 1212 22 

तू अगर बा - वफ़ा नहीं होता
दिल ये तुझपे फ़िदा नहीं होता   
-
इश्क़ तुमसे किया नहीं होता 
ज़िन्दगी में मज़ा नहीं होता
-
ज़िन्दगी तो  संवर गयी  होती 
ग़र वो मुझसे जुदा नहीं होता
-
उसकी चाहत ने कर दिया पागल 
प्यार  इतना  किया  नहीं  होता 
-
सबको दुनिया बुरा बनाती है
कोई इंसाँ बुरा नही होता
-
चोट खाएँ भी मुस्कुराएँ भी
अब रज़ा हौसला नहीं होता.
_____________________
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by SALIM RAZA REWA on Monday
भाई सुरेन्द्र नाथ सिंह जी,
आपकी की बधाई के लिए शुक्रिया
Comment by SALIM RAZA REWA on Monday
भाई नीलेश जी आपकी मुहब्बत और
टंकण गलती अवगत कराने के लिए बहुत शुक्रिया,
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on Monday
आद0 सलीम जी सादर अभिवादन। अच्छे अशआर हुए हैं। हार्दिक बधाई।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on Sunday

आ. सलीम साहब,
तीसरे शेर में ..हँसी को हसीं कर लें ..
सबको दुनिया बुरी बनाती है ..बुरा बनाती है ...देखिएगा 
सादर 

Comment by SALIM RAZA REWA on Sunday
आ. अजय तिवारी जी बहुत बहुत शुक्रिया.
आपकी बात समझ नहीं पाया कुछ स्पष्ट करें
Comment by SALIM RAZA REWA on Sunday
मोहित जी बहुत बहुत शुक्रिया.
Comment by Ajay Tiwari on Sunday

आदरणीय सलीम साहब, अच्छे अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई.

दूसरे शेर में एक 'तो' कम है. तीसरा शेर कुछ अपूर्ण सा है. मक्ता बहुत अच्छा है.

सादर 

Comment by Mohit mishra (mukt) on Sunday

प्रेम रंग से सराबोर अच्छी रचना आदरणीय ,
हार्दिक बधाई , सादर।

कृपया ध्यान दे...

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