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ग़ज़ल "ऐसे भी माहौल बनाया जाता है"

22 22 22 22 22 2


रिश्ता जो इक बार बनाया जाता है।
वो फिर सारी उम्र निभाया जाता है।।

ऐसे भी माहौल बनाया जाता है।
कुछ होता कुछ और दिखाया जाता है।।

ऐसा देखा यार सियासत में अक्सर।
इक दूजे को चोर बताया जाता है।।

सच हो पाए जो न किसी भी सूरत में।
क्यों अक्सर वो ख़्वाब दिखाया जाता है।।

 रंग बदलते गिरगिट सा कुछ लोग यहाँ।
मतलब हो तो प्यार जताया जाता है।।

ये सच्चाई तो जग जाहिर है यारो।
जो सच बोले खूब सताया जाता है।।

जो औरों के सुख दुख को अपना समझे।
वो अच्छा 'इंसान' बताया जाता है।।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ajay Tiwari on January 16, 2018 at 5:11pm

आदरणीय कालीपद जी,

फइलुन(112) का प्रयोग मुतकारिब को छोड़ कर अन्य ज्यादातर बहरों में होता है लेकिन इसका सबसे ज्यादा प्रयोग मुतदारिक में होता है मिसाल के लिए : 

 ख़ुदा ही मिला  विसाल-ए-सनम  इधर के हुए  उधर के हुए

रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम  इधर के हुए  उधर के हुए 

                                                            

                                                 - मुंशी घनश्याम लाल आसी

121 के प्रयोग से आपकी मुराद संभवतः बहरे-मीर में इसके प्रयोग से है इसके लिए मीर का ये शेर देखा जा सकता है :

काफ़िर मुस्लिम, दोनों हुए, पर निस्बत उससे कुछ न हुई

बहुत लिए तस्बीह फिरे हम, पहना है जुन्नार बहुत

सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 16, 2018 at 7:12am

हार्दिक बधाई ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 15, 2018 at 5:45am
आद0 सुरेन्दर इंसान जी अच्छी ग़ज़ल कही आपने, बधाई
Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 14, 2018 at 8:40pm

आ अजय तिवारी जी ,नमन , फैलुन( २२ ) का २११ का प्रयोग तो समझमे आगया , कृपया २२ का ११२ या १२१ के रूप में कहाँ प्रयोग होता है एल उदाहरण दे\ सादर 

Comment by Ajay Tiwari on January 14, 2018 at 6:15pm

आदरणीय सुरेन्द्र जी, सादर नमन,

फेलुन(22) को 211 और 112 दोनों वजनों पर एक साथ किसी बह्र में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. फेलुन(22) का  211 के वजन पर सिर्फ मुतकारिब में ही इस्तेमाल होता है.(211 वस्तुत: सिर्फ एक गणितीय प्रारूप है वास्तविक तक्ती मुतकारिब के अर्कानों में होती है). आप द्वारा इस्तेमाल की गयी बह्र मुतकारिब का आहंग है और मुतकारिब में फइलुन (112) का इस्तेमाल संभव नहीं है.

सादर 

Comment by Samar kabeer on January 14, 2018 at 12:19pm

जनाब सुरेन्द्र इंसान जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

जनाब अजय तिवारी जी सब कुछ बता चुके हैं,उनकी बातों का संज्ञान लें ।

Comment by surender insan on January 13, 2018 at 10:08pm

आद. अजय जी सादर नमन जी। ग़ज़ल  को समय देने के लिए बहुत बहुत आभार जी। 

इस बह्र में  22 को 211 या 112 तो किया जा सकता है। 22 को  121 करने की मनाही बारे तो सुना है या पहले फेलुन को 112 न करने बारे भी सुना है जी। 

सादर जी।

Comment by Ajay Tiwari on January 13, 2018 at 5:02pm

आदरणीय सुरेन्द्र जी, खूबसूरत अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई.

मतले के उला में आपने फइलुन(११२) का इस्तेमाल किया है जिसकी इस बह्र में अनुमति नहीं है. कुछ मिसरों को ग़ज़ल की आम प्रवृत्ति के अनुरूप ज्यादा स्वाभाविक वाक्यों के रूप में रखा जा सकता है :

 

इक बार जिसे दोस्त बनाया जाता है। > दोस्त जिसे इक बार बनाया जाता है
फिर जीवन भर साथ निभाया जाता है।। > उससे सारी उम्र निभाया जाता है

 

देखा है यार सियासत में ही ऐसा। > होता है ऐसा तो यार सियासत में > चलता है ऐसा तो यार सियासत में 
इक दूजे को चोर बताया जाता है।।

 

जो सच हो पाए न किसी भी सूरत में।  > सच हो पाए जो न किसी भी सूरत में
क्यों अक्सर वो ख़्वाब दिखाया जाता है।।

 

गिरगिट सा रंग बदलते कुछ लोग यहाँ। > गिरगिट से हैं रंग बदलते लोग यहाँ
मतलब हो तो प्यार जताया जाता है।।

 

सच्चाई है ये तो जग जाहिर यारो। > ये सच्चाई तो जग जाहिर है यारों
जो सच बोले खूब सताया जाता है।।

सादर 

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