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ग़ज़ल - कोई आँचल उड़ान चाहता है

1222 1222 122
तपन को आजमाना चाहता है ।
समंदर सूख जाना चाहता है ।।

तमन्ना वस्ल की लेकर फिजा में।
कोई मुमकिन बहाना चाहता है ।।

जमीं की तिश्नगी को देखकर अब ।
यहाँ बादल ठिकाना चाहता है ।।

तसव्वुर में तेरे मैंने लिखी थी।
ग़ज़ल जो गुनगुनाना चाहता है ।।

मेरी चाहत मिटा दे शौक से तू ।
तुझे सारा ज़माना चाहता है ।।

मेरी फ़ुरक़त पे है बेचैन सा वो ।
मुझे जो भूल जाना चाहता है ।।

चुभा देता है जो ख़ंजर खुशी से ।
वही मरहम लगाना चाहता है ।।

अदब से दूर जाता एक झोंका ।
कोई आँचल उड़ाना चाहता है ।।

दिखा देना हमारे ज़ख्म उसको ।
वो हम पर मुस्कुराना चाहता है ।।

हवा का रुख पलट जाने से पहले ।
वो मेरा घर जलाना चाहता है ।।

अना के साथ वो हुस्नो अदा से ।
नया सिक्का चलाना चाहता है ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on November 25, 2017 at 12:29am
आ0 सन्तोष ख़िरवादकर साहब तहे दिल से शुक्रिया
Comment by Naveen Mani Tripathi on November 25, 2017 at 12:28am
आ0 बहन रक्षिता सिंह जी सप्रेम आभार ।
Comment by Rakshita Singh on November 24, 2017 at 10:43pm
आदरणीय नवीन जी,
बहुत बहुत और बहुत ही खूबसूरत गज़ल के लिए तहे दिल से मुबारकबाद.... स्वीकार करें।
Comment by santosh khirwadkar on November 24, 2017 at 4:27pm
कोई आँचल उड़ाना चाहता है.....आदरणीय ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई!!
Comment by Naveen Mani Tripathi on November 23, 2017 at 11:47pm
आदरणीय तस्दीक अहमद खान साहब बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 23, 2017 at 5:44pm
जनाब नवीन मणि साहिब ,सुन्दर ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें
Comment by Naveen Mani Tripathi on November 22, 2017 at 3:43pm
आ0 कबीर सर सादर नमन । आपका सुझाव ही तो मेरा पुरष्कार है । आपके सुझाव से तो मेरी ग़ज़ल और निखर के आती है । सादर नमन के साथ सादर नमन ।
Comment by Samar kabeer on November 22, 2017 at 2:40pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
'चुभा देता है जो ख़ंजर ख़ुशी से'
इस मिसरे में 'ख़ुशी'शब्द भर्ती का है, इसे बदलने का प्रयास करें,एक सुझाव है,अगर उचित लगे:-
'चुभा देता है ख़ंजर पीठ में जो'

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