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ग़ज़ल नूर की-मुझ को कोई ख़रीद ले सस्ता किए बग़ैर

२२१/ २१२१/ १२२१/ २१२ (अरकान सही क्रम में हैं या नहीं ये मुझे नहीं पता)

मुझ को कोई ख़रीद ले सस्ता किए बग़ैर
रुसवाई यानी हो भी तो रुसवा किए बग़ैर. 
.
रुख्सत किया है ज़ह’न से यादें लपेट कर, 
तन्हा किया है आप ने तन्हा किए बग़ैर.
.
झुकिए अना को छोड़ के गर इल्म चाहिए,
मिलता नहीं सवाब भी सजदा किए बग़ैर.
.
जिस दर पे पूरी होतीं मुरादें तमाम-तर  
हम वाँ से लौट आये तमन्ना किए बग़ैर.
.
मुझ को न हो गुरूर मेरे नूर का कभी  
रौशन ख़ुदाया रखना सितारा किए बग़ैर.
.
देकर ज़ुबान लौटने की बँध न जाते “नूर”
रुख़्सत हुए जहान से वादा किए बग़ैर
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 153

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Comment by Mohammed Arif on September 26, 2017 at 5:23pm
झुकिए अना को छोड़ के गर इल्म चाहिए,
मिलता नहीं सवाब भी सजदा किए बग़ैर.वाह! वाह!! बेहतरीन शेर । हर शेर बेजोड़ ।
दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें आदरणीय निलेश जी ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 26, 2017 at 4:42pm

शुक्रिया आ. रौनक साहिबा 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 26, 2017 at 4:33pm

खुबसूरत ग़ज़ल आदरणीय निलेश जी | हार्दिक बधाई |

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 26, 2017 at 2:57pm

शुक्रिया आ. डॉ आशुतोष जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 26, 2017 at 2:57pm

शुक्रिया आ. सलीम रज़ा साहब 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 26, 2017 at 2:29pm

आदरणीय भाई नीलेश जी आपकी तो हर रचना ही लाजवाब होती है .उसी कड़ी में इस शानदार ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई प्रेषित है सादर 

Comment by SALIM RAZA REWA on September 26, 2017 at 1:29pm
वाह वाह आ. नीलेश जी,
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद हर शेर लाजवाब, हर शेर के लिए मुबारक़बाद,..

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