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ग़ज़ल-गलतियाँ किससे नही होतीं-रामबली गुप्ता

ग़ज़ल
2122 2122 2122 212

गलतियाँ किससे नही होतीं भला संसार में
है मगर शुभ आचरण निज भूल के स्वीकार में

शून्य में सामान्यतः तो कुछ नही का बोध पर
है यहाँ क्या शेष छूटा शून्य के विस्तार में

आधुनिकता के दुशासन ने किया ऐसे हरण
द्रौपदी निर्वस्त्र है खुद कलियुगी अवतार में

सूर्य को स्वीकार गर होता न जलना साथियों
तो भला क्या वो कभी करता प्रभा संसार में

व्यर्थ ही व्याख्यान आदर्शों पे देने से भला
अनुसरण कुछ कीजिये इनका निजी व्यवहार में

लालसा दिल में यही मिल जाय वो मीठा शहद
जो मिला था माँ की लोरी थपकियों और प्यार में

प्रेम पूजा प्रेम ईश्वर प्रेम के ही पंथ सब
प्रेम ही कुरआन गीता बाइबिल के सार में

श्रम दिलों को जीतने में चाहिए उतना बली
चाहिए जितना हमें निज अहं के संहार में

रचना-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by गिरिराज भंडारी on September 26, 2017 at 9:25pm

आ. राम बली भाई , बेहतरीन गज़ल कही है , शेर दर शेर मुबारक बाद पेश है , स्वीकार करें ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on September 26, 2017 at 8:02pm
आद0 रामबली गुप्ता जी सादर अभिवादन, बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Niraj Kumar on September 26, 2017 at 7:25pm

आदरणीय रामबली जी,

उर्दू के उस्ताद शायरों की तरफ न भी जाय तो हिंदी में दुष्यंत के यहाँ भी ऐसी ग़ज़लों की कोई कमी नहीं.

सादर 

Comment by रामबली गुप्ता on September 26, 2017 at 7:09pm
हार्दिक आभार आदरणीय नीरज जी आपकी नेक सलाह के अनुसार लिखने का प्रयास रहेगा। किन्तु यदि आप साथ ही किसी इशारे वाली ग़ज़ल का उदाहरण देकर बताते तो शायद इस संदर्भ में प्रत्यय और अधिक स्पष्ट हो पाता। सादर
Comment by Niraj Kumar on September 26, 2017 at 6:47pm

आदरणीय रामबली जी,

आच्छी कोशिश है. लेकिन अभी इसमें ग़ज़ल की रूह नहीं है. ग़ज़ल सीधे उपदेश नहीं देती. ग़ज़ल बात को इशारों में कहने की कला है.

सादर 

Comment by रामबली गुप्ता on September 26, 2017 at 5:32pm
इस आत्मीय सराहना एवं प्रोत्साहन के लिए हृदय से आभार आदरणीय सुशील सरना जी
Comment by Sushil Sarna on September 26, 2017 at 1:47pm

गलतियाँ किससे नही होतीं भला संसार में?
है मगर शुभ आचरण निज भूल के स्वीकार में।

शून्य में सामान्यतः तो कुछ नही का बोध पर,
है यहाँ क्या शेष छूटा शून्य के विस्तार में?

आधुनिकता के दुशासन ने किया ऐसे हरण,
द्रौपदी निर्वस्त्र है खुद कलियुगी अवतार में।

अनुपम,अद्भुत,अप्रतिम और सारगर्भित इस बेहतरीन ग़ज़ल की पेशकश पर आपको कोटि कोटि बधाई आदरणीय रामबली गुप्ता जी।

Comment by रामबली गुप्ता on September 26, 2017 at 1:35pm
सादर आभार आदरणीय आशुतोष मिश्र जी
Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 26, 2017 at 1:32pm

आदरणीय रामबली जी सार्थक संदेशों को समाहित किये वर्तमान परिदृश्यों को चित्रित करती हुयी शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर

Comment by रामबली गुप्ता on September 26, 2017 at 11:50am
धन्यवाद आदरणीया कल्पना भट्ट जी

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