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रकीबों को उठाया जा रहा है ।
किसी पर जुल्म ढाया जा रहा है ।।

मैं छोड़आया तुम्हारी सल्तनत को।
मगर चर्चा चलाया जा रहा है ।।

मुखौटे में मिले हैं यार सारे ।
नया चेहरा दिखाया जा रहा है।।

सुखनवर की किसी गंगा में देखा ।
नया सिक्का चलाया जा रहा है ।।

सही क्या है गलत क्या है ग़ज़ल में ।
नया कुछ इल्म लाया जा रहा है ।।

अदब से वास्ता जिसका नहीं था ।
उसे आलिम बताया जा रहा है ।।

सिकेंगी रोटियां अब खूब साहब ।
हमारा दिल जलाया जा रहा है ।।

--नावीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on Saturday
आ0 ब्रजेश कुमार ब्रज जी सादर आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on Saturday
आ0 कल्पना भट्ट रौनक जी सादर आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on Saturday
आ0 गिरिराज भंडारी सर सादर आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on Saturday
आ0 कबीर सर सादर आभार
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 16, 2017 at 3:16pm
खूबसूरत ग़ज़ल हार्दिक बधाई

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 16, 2017 at 10:53am

आदर्णीय नवीन भाई ,अच्छी गज़ल कही है. गज़ल के लिये आपको बधाइयाँ ।

Comment by Samar kabeer on September 14, 2017 at 5:56pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के सानी मिसरे में 'जुर्म'को "ज़ुल्म'कर लीजिये, जुर्म किया जाता है,और ज़ुल्म किया भी जाता है और ढाया भी जाता है,यहाँ "ज़ुल्म"ही मुनासिब होगा ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 14, 2017 at 4:13pm

वाह , बहुत खुबसूरत ग़ज़ल कही है आपने आदरणीय , हार्दिक बधाई आपको |

Comment by Naveen Mani Tripathi on September 13, 2017 at 9:37pm
भाई अफरोज साहब इसे अविलम्ब ठीक करता हूँ
Comment by Afroz 'sahr' on September 13, 2017 at 9:32pm
आदरणीय नवीन जी अच्छी ग़जल की आपको बधाई देता हूँ ""तोहमत"" (स्त्रीलिंग) अर्थात मुअन्नस है! आपने कहा है! ""नया तोहमत लगाया जा रहा है""

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