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मेरे घर, मेरे शहर, मेरे लफ्जों को
एक आहट सी लगी,
कि कोई उन्हें छूकर चला गया.. 

वो ठंडी सी छुवन, 
एक भंवर सी कम्पन... 
लगा पहाड़ों से कोई 
मंदाकिनी आ गयी.. 
लगा मेरे लफ्जों को, 
एक आवाज सी मिल गयी.. 
जैसे मेरे गीतों को, 
कोई छूकर चला गया... 

उन्हें कहें भी,
क्या कहें..
किस हक़ से कहें ?
कि दीदार तो जरूरी था..
इन्तजार तो जरूरी था,
या वो ऐतबार भी जरूरी था.. 
जैसे मेरा कोई अपना हो,
जो छूकर चला गया... 

चलो मान ली बातें तुम्हारी,
सुन ली शिकायतें सारी.. 
लफ्ज,अल्फाज भी सब तुम्हारे,
किरदार भी तुम्हारे..
वो दिन, वो रात, वो मौसम, 
फासले, नजदीकियां..
फिर भी साँसों को मेरी, 
कोई छूकर चला गया..

वो तुम थी....

"मौलिक और अप्रकाशित"

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Comment by गिरिराज भंडारी on September 13, 2017 at 9:41pm

आदरणीय गौनिया जी , अच्छी कविता हुई है , बधाइयाँ । आ. समर भाई जी की बातों से सहमत हूँ ।

Comment by Mohammed Arif on September 12, 2017 at 2:35pm
प्रिय बीएस गौनिया जी आदाब, अच्छी रचना । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । गुणीजनों की बातों का संज्ञान लें ।
Comment by BS Gauniya on September 12, 2017 at 11:09am

 आभार 

Comment by Mahendra Kumar on September 11, 2017 at 8:34pm

अच्छी भावाभिव्यक्ति है आ. बीएस गौनिया जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए और आ. समर सर की बातों का संज्ञान लीजिए. सादर.

Comment by Samar kabeer on September 11, 2017 at 7:29pm
जनाब बीएस गौनिया जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
'वो तुम थी' को "वो तुम थीं" कर लें ।
'लफ़्ज़ अल्फ़ाज़ भी सब तुम्हारे'
इस पंक्ति में 'अल्फ़ाज़'शब्द 'लफ़्ज़'का बहुवचन है, इसलिये ये पंक्ति यूँ होना चाहिये "अल्फ़ाज़ भी सब तुम्हारे"।

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