'ग़ज़ल'
दुआओं से किसी की फल रहा हूँ
निगाहों में तुम्हारी खल रहा हूँ
किसी को भी नहीं मैं छल रहा हूँ
न तो रहमोकरम पर पल रहा हूँ
बुरा था वक्त पीछे छोड़ आया
नहीं भूला जहाँ पर कल रहा हूँ
हिमालय की रुपहली बर्फ पर जा
वतन के वास्ते मैं गल रहा हूँ
दिलों में प्यार की शमआ जलाने
मैं अपनी रहगुज़र पर चल रहा हूँ
दुआयें माँ की अपने साथ में ले
बुजुर्गों का मुसलसल बल रहा हूँ
किसी के प्यार में भूला तुम्हें क्यों
तुझे खोकर हथेली मल रहा हूँ
भुला दूं तुमको कैसे आज जानम्
पहेली तुम तुम्हारा हल रहा हूँ
सियासत से रहो तुम दूर ‘अम्बर’
बुरी है आग नाहक जल रहा हूँ
--अम्बरीष श्रीवास्तव
Comment
Comment by Er. Ambarish Srivastava on July 14, 2012 at 11:19pm धन्यवाद आदरणीय भ्रमर जी ! आपकी सराहना से हृदय में एक नवऊर्जा का संचार होता है ....सादर
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 21, 2012 at 11:27pm दिलों में प्यार की शमआ जलाने
मैं अपनी रहगुज़र पर चल रहा हूँ
दुआयें माँ की अपने साथ में ले
बुजुर्गों का मुसलसल बल रहा हूँ
आदरणीय अम्बरीश जी बहुत सुन्दर भाव लिए गजल ...हिंद और पाक का बाघा बार्डर याद हो आया वहां गुजारे वक्त ...आभार आप का ..माँ की दुवाएं हमारे वीरों के साथ सदा रहें -भ्रमर ५
Comment by Er. Ambarish Srivastava on May 1, 2012 at 12:24am स्वागत है मित्र शैलेन्द्र जी ! आपका हार्दिक धन्यवाद |
Comment by CA. SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 30, 2012 at 12:33pm बुरा था वक्त पीछे छोड़ आया
नहीं भूला जहाँ पर कल रहा हूँ
हिमालय की रुपहली बर्फ पर जा
वतन के वास्ते मैं गल रहा हूँ
दिलों में प्यार की शमआ जलाने
मैं अपनी रहगुज़र पर चल रहा हूँ
मुसलसल गजल पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें अम्बरीष सर
Comment by Er. Ambarish Srivastava on April 30, 2012 at 9:15am नमस्कार महिमा जी, गज़ल को सराहने के लिए आपका हार्दिक आभार !
हिमालय की रुपहली बर्फ पर जा
वतन के वास्ते मैं गल रहा हूँ
दिलों में प्यार की शमआ जलाने
मैं अपनी रहगुज़र पर चल रहा हूँ
आदरणीय अम्बरीश सर , नमस्कार
Comment by Er. Ambarish Srivastava on April 29, 2012 at 3:55pm स्वागत है आदरणीय कुशवाहा साहब , आपका हार्दिक आभार ! बहुत अच्छी पंक्तियाँ कही हैं आपने !
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 29, 2012 at 2:16pm aadarniy ambrish ji, saadar.
chitra hi mere lahoo ke ubal ke liye kaafi hai
gajal to puri ki imtihaan abhi baaki hai.
ye achha hi kiya na likha paimane par
bahah tere intjar main khadi ek saaki hai.
laakh sitam ye kar len rahnuma mere
bah chuka bah raha par abhi bhi lahoo baaki hai.
badhai.
Comment by Er. Ambarish Srivastava on April 28, 2012 at 5:48pm स्वागत है आदरणीया वंदना जी ! गजल की तारीफ़ के लिए तहे दिल से शुक्रिया !
Comment by vandana gupta on April 28, 2012 at 1:09pm एक बेहतरीन शानदार गज़ल
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