आगॆ बढ़ कॆ बता,,,,
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हिम्मत है तॊ आगॆ बढ़ कॆ बता ॥
बिहार वाली ट्रॆन मॆं चढ़ कॆ बता ॥१॥
बिना टिकट गांव चला जायॆगा,
म.न.सॆ वालॊं सॆ झगड़ कॆ बता ॥२॥
अरबी- फ़ारसी झाड़ता है बहुत,
तू चायनीज़ गज़ल पढ़ कॆ बता ॥३॥
चॊर कह कॆ भिखारी कॊ पकड़ा,
वर्दी वाला चॊर तॊ पकड़ कॆ बता ॥४॥
भाव-बॆभाव डंडॆ पड़ॆंगॆ दॆख फिर,
उस सॆ भी जरा अकड़ कॆ बता ॥५॥
गरीब कॆ गाल पॆ तमाचा दिया,
अमीर कॆ गाल पॆ जड़ कॆ बता ॥६॥
भॆंड़ॊं कॆ सामनॆ मूंछॆं उमॆंठता है,
भॆड़ियॆ कॆ सामनॆ रगड़ कॆ बता ॥७॥
शायर समझ कॆ लड़ता क्या बॆ,
इरफ़ान दादा सॆ तॊ लड़ कॆ बता ॥८॥
खॊदता है खड्डा गैरॊं कॆ वास्तॆ,
खुद भी तॊ उसमॆं गड़ कॆ बता ॥९॥
बात बात पॆ बिगड़ता है "राज",
घर मॆं बीबी सॆ बिगड़ कॆ बता ॥१०॥
कवि-राज बुन्दॆली
२३/०४/२०१२
Comment
Comment by Abhinav Arun on April 24, 2012 at 11:33am एक दम खरी खरी कवि राज जी !! इस खांटी ग़ज़ल के लिए शुद्ध बधाइयाँ !!
Comment by कवि - राज बुन्दॆली on April 24, 2012 at 9:38am संदीप जी,,,,,बहुत बहुत धन्यवाद,,,,,,,,,,आपका,,,,
कमी शायद मिसरो की बह्र मे होगी,,,,,मुझे उसका ग्यान नहीं है,,,मूलत: हिन्दी का रचनाकार हूं,,,,,
और कोई उस्ताद मिला नहीं,,,बस जो ख्याल आ जाते है कह देता हूं,,,,,,,,,,धन्यवाद,,,,,,,,,,
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on April 24, 2012 at 2:57am बहुत ही अच्छी कहन कविवर...! सुंदर ग़ज़ल..! बस एक कमी लगी किन्तु आपकी महान शख्सियत के आगे उसका उल्लेख अर्थहीन है| हार्दिक बधाई आपको सर..!
Comment by कवि - राज बुन्दॆली on April 24, 2012 at 2:18am मंच का दिल से शुक्रिया,,,,,,,,,,,
Comment by कवि - राज बुन्दॆली on April 24, 2012 at 2:18am शैलेन्द्र सिंह जी,,,,,,,बहुत बहुत धन्यवाद,,,,,,,,,,,,,,,,,आभार,,,,,,,,,,
Comment by कवि - राज बुन्दॆली on April 24, 2012 at 2:17am सीमा दीदी,,,,,प्रणाम,,,,,,,,,,,,,,,,आभार ,,,,,,,धन्यवाद,,,,,,,,,,,
Comment by कवि - राज बुन्दॆली on April 24, 2012 at 2:16am राजेश कुमारी जी,,,,नमन आपको..............
Comment by CA. SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 23, 2012 at 10:37pm गरीब कॆ गाल पॆ तमाचा दिया,
अमीर कॆ गाल पॆ जड़ कॆ बता ॥६॥
खुबसूरत रचना पर बधाई स्वीकार करें

अरबी- फ़ारसी झाड़ता है बहुत,
तू चायनीज़ गज़ल पढ़ कॆ बता ॥३॥kya baat hai ..hahaha

क्या कहूँ राज बुन्देली जी ग़ज़ल पढ़ते पढ़ते पहले तो हंसी ही नहीं रुक रही कौन से शेर की बात करूँ सब एक के ऊपर सवा सेर हैं और अंतिम शेर तो कमाल का हैबात बात पॆ बिगड़ता है "राज",
घर मॆं बीबी सॆ बिगड़ कॆ बता ॥१०॥ हाहाहा बहुत दिनों बाद एक अच्छी हास्य ग़ज़ल पढ़ी
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