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काश
कि उसी वक्त देख लेता
पलट कर पन्ने
उस किताब के ,
जो तुमने वापस कर दी
भीगी आँखों के साथ !
और मैंने उसे इंकार समझा
अपने प्रणय निवेदन का !
.
और जब आज
हम दोनों ने थाम रखे है
दो अलग अलग सिरे
जिंदगी के !
तो अनायास ही
हाथों में आई वो किताब !
थरथरा गया अस्तित्व !
जैसे कोई रेल गुज़री हो
किसी पुराने पुल से !
बिखर गए किताब के पन्ने !
और पन्नों के बीच
एक सुख चुका गुलाब
जो मैंने नही रखा था !
.
काश
कि उसी वक्त देख लेता
पलट कर पन्ने
उस किताब के !


....................... अरुन श्री !

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Comment by Arun Srivastava on April 20, 2012 at 9:59am

दिव्या मैम ,  आपकी  सराहना के लिए धन्यवाद !

Comment by दिव्या on April 20, 2012 at 9:38am

पुरानी किताब के पन्ने पलटना  मन मे एक टीस उठा गया ........... काश हमेशा रह जाता है |

 काश
कि उसी वक्त देख लेता
पलट कर पन्ने
उस किताब के !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 19, 2012 at 9:13pm

भाई अरुण जी और सरिता जी, इस अदम्य विश्वासी वार्तालाप से मन विभोर हो गया. 

आप दोनों गुणीजनों को मेरा हार्दिक धन्यवाद ..   :-)))

Comment by Arun Srivastava on April 19, 2012 at 8:56pm

सरिता सिन्हा मैम ,
अब क्या करें गलती हो ही गई तो ! अगली बार कोई किताब वापस मिलेगी तो जरूर देखूंगा !   :)) :))

माहौल हल्का करने के लिए आपका धन्यवाद , आपकी विनोदप्रियता का अभिनन्दन !

Comment by Sarita Sinha on April 19, 2012 at 5:51pm
अरुण जी नमस्कार,
बड़ी करुण कथा है,इसी लिए कहा जाता है कि हर समय चैतन्य रहना चाहिए..उसी समय देखना चाहिए था न....
क्षमा कीजिये गा...भारी माहौल थोडा हल्का भी तो होना चाहिए...वरना गम तो गले का पत्थर होता है, डुबा कर ही छोड़ता है..
Comment by Arun Srivastava on April 19, 2012 at 12:35pm

प्रदीप सर , बहुत बहुत धन्यवाद !

Comment by Arun Srivastava on April 19, 2012 at 12:35pm

महिमा श्री जी , आपकी आत्मीय प्रतिक्रिया ने उत्साहित किया ! धन्यवाद !

Comment by Arun Srivastava on April 19, 2012 at 12:33pm

राजेश कुमारी मैम , जिंदगी के सफर में अक्सर वक्त बहुत कुछ हमसे छीन लेता है और कुछ हम खुद खो देते है और फिर बस एक ही शब्द बचता है अपने पास " काश ......................... !"
आपने कविता को सम्मान दिया इसके लिए आभारी हूँ !

Comment by Arun Srivastava on April 19, 2012 at 12:31pm

वंदना गुप्ता मैम , आपका निशब्द होना मेरे लिए सम्मान की बात है ! आपकी प्रतिक्रिया आत्ममुग्धता का कारण बनी ! दृष्टी बनाए रखें ! सादर धन्यवाद !

Comment by Arun Srivastava on April 19, 2012 at 12:30pm

शैलेन्द्रर कुमार भ्रमर सर , सच कहा ऐसा भी  होता है ! और हमें पता चलता है देर हो चुकी होती है ! धन्यवाद !

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